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Anjana Singh (Anju)

Abstract

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Anjana Singh (Anju)

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बचपन के वो दिन

बचपन के वो दिन

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ऐ बचपन कहां तू चला गया

ढूंढती फिरूं तुझें यहां वहां

पलटा जो मैंने अतीत का पन्ना

बचपन तू तो मुस्कुरा दिया


बचपन की वो आंखों की चमक

हर बातों में रहती थी मीठी सी महक

गूंज उठती थी महफिल में खनक

जाने कहां गई वो बचपन की चहक


ना कोई गम था ना कोई दर्द

सारें ही होते हमदर्द

मुस्कान वो कितनें सच्चें थे

सपने सारें अच्छे थे


गिर कर फिर संभलते थे 

बड़े चैन से सोते थे

माना अक्ल से कच्चें थे

पर मन से बेहद सच्चें थे


बड़े हुए तो रूठ गई

वो दुनिया प्यारें बचपन की

नई उम्मीदों के संग में

खुशियां बचपन की छूट गई


आज के व्यस्त जीवन में

दोस्तों का संग कहां रह पाता है

वह मासूमियत और मुस्कान

दबा ही रह जाता है


बचपन का वो दिन कभी

 वापस नहीं आ सकता है

सुहानी यादों का खजाना

 मन को बेहद भाता है


आजकल के बच्चों को

वो बचपन कहां मिल पाता है

घर की चारदीवारी में ही

कैद होकर रह जाता है


धीरे-धीरे वो प्यारा बचपन

कहीं खो सा गया

समय के साथ साथ

सपनों का घरौंदा भी टूट गया


आप जब देखती हूं पीछे मुड़कर

धुंधली सी याद नजर आती है

घर की जिम्मेदारियों में फंसी

बीतें बचपन की याद आती है


याद करूं जो बचपन को

आंखों में आंसू आ जाते हैं

बचपन के वह पुरानें लम्हें

 बेहद याद आते हैं


पुनः वो बचपन फिर

कहां लौट पाता है

हर बच्चा वक्त से पहले

बड़ा जो हो जाता है


आज मन करता है 

फिर बच्चा बन जाऊं

वही शरारतें और शैतानियां

फिर से मैं दोहराऊं


ऐ बचपन तू यूं ही

मुझमें थोड़ा जिंदा रहना

वो मासुमियत वो सच्चाई

मुझ में हमेशा रहने देना।


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