बचपन के दो पहलू
बचपन के दो पहलू
बच्चे कितने प्यारे होते हैं
कितने मन के सच्चे होते हैं
यह तो जानते हैं, मानते हैं सभी
उन की भोली सी मुस्कान में
लगता है बसते हैं भगवान
उनकी चंचलता अनायास ही
कर देती है सभी को विभोर
प्रकृति की, सृष्टि की
सबसे अनमोल देन
सबसे अप्रतिम रचना।
एक झलक उनके मासूम चेहरे की
मिटा देती है दिन भर की थकान
शरीर कितना ही न थका हो
मन को कर देती है तरोताज़ा।
उनकी खुशी और खुशहाली
बन जाती है हमारी ज़िंदगी
हमारी दुनिया, हमारी ज़रूरत
हमारी प्रेरणा
यह तो है सिक्के का पहलू एक
पर वह दूसरा पहलू जो आता है
हम शिक्षकों के सामने,
कुछ कम रोचक नहीं
रोचक औरों के लिए
पर यंत्रणा उन के लिए
जो लगे रहते हैं
उनके आगे पीछे।
कैसे करायेंगे इन्हें चुप,
बिठाएंगे सलीके से
कब और कैसे पहुंचेगी उनकी तक
अपनी आवाज़- कितनी ताक़त की
हैं दरकार इस का अंदाजा
लगाना है नामुमकिन
चीखना पड़ता है कभी कभी
चिल्लाए बगैर चले न काम कभी
पर बच्चे जब होते हैं इकट्ठे
आएं न आसानी से हाथ
हाथ, पैर और मुंह चलते है
बिना अर्ध या पूर्ण विराम के
खींच रहे हैं कभी एक दूसरे के बाल
कभी बाल की निकाल रहे हैं खाल
कभी पेन तो कभी पेंसिल
की हो रही छीना-झपटी
रोकने की हर कोशिश
कभी कभी लगती है बेकार
पराजय का होता है अहसास
लगती है ठेस हर कड़े से कड़े
कोमल से कोमल उस बेचारे
शिक्षक को जो इस से पहले
था अनजान, इन बच्चों की
क्षमता से।
नाराज़ कभी नाखुश
कभी आ जाएं आंखों में
झुंझलाहट के आंसू
कभी कभी लगे क्या थी ज़रूरत
यह मुसीबत मोल लेने की
कभी ख़ुद को समझने की
करें कोशिश, कभी उन को
समझने की हिमाकत
परंतु हर बार, हर बार,
हृदय हो जाता गद् गद, आंखें नम
जब भूल कर डांट डपट को
आकर प्यार से लग जाते हैं गले।
तब दिल हमारा उनकी मुट्ठी में
और जान हमारी उन पर न्योछावर
मनमानी उनकी है जितनी सहज
उमड़ता प्यार भी उतना ही सहज
सिक्के के ये दोनों, पहलू ही तो हैं
दोनों ही हैं सुन्दर, दोनों की है दरकार।
