STORYMIRROR

Prashant Beybaar

Abstract Others

2  

Prashant Beybaar

Abstract Others

बात करूँ तो खो जाऊँ

बात करूँ तो खो जाऊँ

1 min
99


बात करूँ तो खो जाऊँ, वृंदावन की गली हो तुम

कभी उठती बैठती, मटकती अल्हड़ चली हो तुम

पैरों में बिछुए कसे थे, मगर सरके सरके जा रहे

नाज़ुक गुदाज़ उंगलियाँ, मखमल की डली हो तुम



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract