STORYMIRROR

Prashant Beybaar

Abstract

4  

Prashant Beybaar

Abstract

ऐसे भी ग़म होते हैं जो दिल में घर कर जाते हैं

ऐसे भी ग़म होते हैं जो दिल में घर कर जाते हैं

1 min
295

ऐसे भी ग़म होते हैं जो दिल में घर कर जाते हैं

घर की चाहत रखने वाले यूँ ही बेघर जाते हैं 


मुद्दतों ना हाल पूछा, दिल में बस रक्खा गुमां

ख़्वाब आँखों की सतह पे ऐसे ही मर जाते हैं


तुम वो पहले शख़्स कब हो, लोग ऐसे ही मिले

क़ुर्बतों का वादा कर के दूर अक्सर जाते हैं


कितना चाहा भूल जाएँ, याद पर ऐसी सिफ़त

हर सुबहा ख़ाली हुए, रात तक भर जाते हैं


अपनी औलादों को मज़हब की विरासत न मिले

ख़ून दिल्ली में जो देखा मन ही मन डर जाते हैं


नौकरी क्यूँ दम न लेगी, मन भला कैसे लगे

ख़्वाब तकिये में सुलाकर रोज़ दफ़्तर जाते हैं.



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract