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Shubhra Varshney

Abstract

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Shubhra Varshney

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बात आज कीबात आज की

बात आज कीबात आज की

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बात आज की तमन्नाओं से परे की सोच का दौर,

तूफ़ां से पहले की ख़ामोशी और फिर बहुत सारा शोर।

बात आज की ज़ेहन और रूह की तकरार,

नासाज़ सी तबियत और फिर उतरता बुख़ार।

बात आज की ख्वाबों की बनती बेफिक्र तस्वीर ,

हुनरमंदी की हवा में मिलती तालीम की तकद़ीर।

बात आज की तमन्नाओं का उमड़ता उफान,

दरकते जज़्बात और रुकावटो का तूफ़ान।

बात आज की सवालात के पीछे के सव़ाल,

बेरहम सच्चाई का दौर कलम का मचता बव़ाल।

बात आज की समंदर के तले की गहराई,

ज़िंदगी की जलाती धूप अपनों की रुसवाई।

बात आज की अपनों के अंदर जमता मैल,

लव़ो की झूठी मुस्कुराहटों पर खड़ा शोहरत का महल।

बात आज की स्याह होता सच का दुशाला,

आगे बढ़ने की होड़ मक्कारी की पाठशाला।

बात आज की उलझी ज़िन्दगी में सुई सी चुभन,

जलते नंगे पांव अंगारों सा जलता व्याकुल मन।

बात आज की व़क्त की बेतहाशा तेज रफ़्तार,

ज़ीने का जोख़िम उस पर जान बनी व्यापार।

बात आज की थकी हुई सांसें भागती ज़िंदगानी,

भागता शहर बदलती रोज़ यहाँ हर एक कहानी।

बात आज की हंसती है फ़िज़ा दुखी है इंसान,

आती मौत भी वक़्त बेवक्त लगे अनचाही मेहमान।

बात आज की हांफ़ती रुह तरक्की की पुकार,

उखड़ते जमते पैर सिर पर खिंची तलवार।

बात आज की समय से उम्र की चोरी,

करने को फ़तेह दुनिया है वक़्त की सीनाज़ोरी।

बात आज की एक नई सुबह से टूटता नया सपना,

ख़ुद परस्ती के इस दौर में बेवफ़ा लगे हर अपना।

बात आज की कभी यह तेरा कभी यह मेरा,

चकाचौंध दुनिया में धूमिल होता हर नया सवेरा।

बात आज की नई ख़ून का दौर मतलबी अंगड़ाई,

सिकुड़े दिल जकड़ा द़िमाग रिश्तो की जगहंसाई।

बात आज की चुग़लख़ोरी का बाज़ार जरूरतों का गुलाम,

ह़क अदाई भी दुनिया में लगता है अब अधूरा सा काम।

बात आज की चुहलवाज़ियों पर जन्मों से जाई आदतें,

पत्थर बरसाती दुनिया पखरी पुरानी ताकतें।

बात आज की अंधमुंदी आंखों में खोया हुआ चांद,

वक्त की तग़ाफ़ुल पर भारी पड़ता तपता उन्माद।

बात आज की सदियों से सड़ती जड़ों से रिसता हुआ रक्त,

मर्यादा की बेड़ियों से जकड़ा कसमसाता है अब वक़्त।

बात आज की और इसे कलमबंद करने का मेरा इरादा,

सुकून व समझ में तकरार बेचैनी से कर लिया वायदा।



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