STORYMIRROR

Kunda Shamkuwar

Abstract Fantasy

4  

Kunda Shamkuwar

Abstract Fantasy

अस्तित्व

अस्तित्व

1 min
257

मेरी पसंद तुम्हारे आसपास ही बनी रही 

तुम्हारी पसंद मेरी पसंद बनी रही

मेरी पसंद कभी मेरी रही ही नहीं

हर चीज़ में.....

हर बात में......

हर बार......

बार बार.....


कभी कभी मुझे लगता है 

क्या मेरा कोई अस्तित्व है ?

मैं खुद से ही पूछती रहती हूँ

मन ही मन...  

कभी कभी तुमसे भी.....


मेरे स्वतंत्र अस्तित्व के सवाल पर तुम प्यार से कह देते हो

तुम्हारे बिना मैं खुद को सोच भी नही पाता हूँ......

तुम्हारे बिना मै कुछ भी नहीं...   

सुनकर मैं खुशी से दमकने लगती हूँ

फिर मैं झट से तुम्हारी पसंद की साड़ी पहन आईने के सामने खड़ी हो जाती हूँ

आईने से झाँकती स्त्री 'मैं' नहीं होती हूँ

मिसेस शर्मा वर्मा टाइप की कोई महिला लगती है

जिसे कुछ लोग पिंकी की मम्मी के नाम से जानते हैं

आईने में मैं मुस्कुराती नज़र आती हूँ

आईना भी मुझे देख हँसता रहता है

वह मुझसे सवाल करना भूल जाता है

वही बार बार सिर उठाने वाले सवाल

जिन्हें मैं बार बार अंदर कही गहरे दबा देती हूँ

कभी प्यार से.....

कभी ख़ौफ़ से.....

कभी इज़्ज़त की दुहाई देकर.....

आईने को हँसता देख मैं झट वहाँ से हट जाती हूँ

और बच्चों की फ़रमाइशों में खो जाती हूँ

मैं फिर से घर परिवार में खो जाती हूँ.....


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract