अपनी पीड़ा
अपनी पीड़ा
माप सके तो मापे कोई,
मैं घावों का एक समंदर ।
हमने अपनी पीड़ा हर पल,
राखी अपने दिल के अंदर ।
सुनी सभी की उल्टी सीधी,
मौन रहे हम कुछ ना बोले ।
यदि जवाब भी दिए कभी तो,
उत्तर पहले हमने तोले ।
आघातों को सह कर हमने,
बस सबका सम्मान किया है ।
धन्य धरा की खातिर हमने,
यह तन जीवन दान दिया है ।
हम सुधरे तो जग सुधरे गा,
मन ख्वाबों का एक बवंडर ।
हमने अपनी पीड़ा हर पल,
राखी अपने दिल के अंदर ।
जिस पथ से हम जब भी गुजरे,
सारे कांटे बीन लिए है ।
हमने अपने अंतरमन से,
बागी स्वर सब छीन लिए है ।
दुनिया वालो ये मत समझो,
आघातों से डर जाऊँगा ।
मैं संकल्पित यायावर हूँ,
चलते-चलते मर जाऊँगा ।
खाली हाथ यहाँ से जाते,
देखे है जी कई सिकंदर ।
हमने अपनी पीड़ा हर पल,
राखी अपने दिल के अंदर ।
