अपने हक में ऊँची आवाज़ न करूँ?
अपने हक में ऊँची आवाज़ न करूँ?
आपकी मर्ज़ी चाहे ढा लीजिये जितने सितम ,
हम अपने हक में ऊँची आवाज़ नहीं कर सकते!
यूं किसी और को हमराज़ नहीं कर सकते ,
एक दिल है उसे नाराज़ नहीं कर सकते !
नाम के हर्फ़-ए-रवी तक में हूँ शामिल मैं तो ,
आप मुझ को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते!
गाहे गाहे तिरी आँखें वो बयांँ करती हैं ,
जो बयांँ महज़ ये अल्फाज़ नहीं कर सकते !
शाख़ से टूटे हुए फूल भी काम आते हैं ,
तेरे ठुकराए हैं तो नाज़ नहीं कर सकते !
दर्द की टीस से निकले है हर इक धुन यारा ,
हम जो कर सकते हैं वो साज़ नहीं कर सकते !

