अपना हमदम
अपना हमदम
खुद को मैंने बनाया है अपना हमदम
न तलाश किसी की न साथ की चाह है
हर खुशी में पीठ खुद की थपथपाई है
गम की आई जब घड़ी है
कंधे पर खुद के सिर रख कर
आंसू बहाई है
चाहा जब ज़माने ने मिटाना
उड़ कर आसमान छूने की
मन ने हुंकार लगाई है
हो जाती हूं जब जब अकेली
अक्षरों के फूलों को चुन चुन
कविताओं की माला बनाई है
अहसास जब जब करते मनमानी
कहानी के पात्र बन उभर आते हैं।
