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ashok kumar bhatnagar

Inspirational

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ashok kumar bhatnagar

Inspirational

" अंगारों की जंजीरों में बंधा "

" अंगारों की जंजीरों में बंधा "

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ज़िन्दगी की इस मोड़ पर, जहां आग की जब्दों में हूँ,

चिरागों की जगमगाहट से आसमान छू।

मेरे दिल में जलती हैं अग्नि की रोशनी,

पर मेरे आस-पास हैं आबादी की गहराई।


ये ज्वाला की जड़ें मुझे बांधती हैं,

सोचों के पट से उठकर उड़ती हैं।

मेरे आस-पास चिढ़ी हुई तारों की जुबां,

बोलती हैं मेरे अंतर के आग की कहानी।


ज़िन्दगी के तारे, ज़रा सौंधी सी हैं,

जब जड़ों के बंधन से प्राणों को बाँधती हैं।

पर जब उड़ने का इरादा सब के मन में हो,

तो जड़े टूटकर आसमान को छू सकती हैं।


दबी हुई आग को जगाने का हौसला हैं,

उजाले के पट से मन को रोशनी छिड़कती हैं।

जीने की चाह से रूह को जकड़ती हैं,

मैं चाहता हूँ आग की जब्दों से मुक्ति पानी हैं।


उठती रेत की जंजीरें,

आग की बुनियादों में उभरी कठिनाइयाँ।

इश्क़ की आग में पिघलते सपने,

जीवन की कविता में छिपी कहानियाँ।


उठ खड़ा हुआ वीर युवक, संघर्ष का धनी,

मोह मुक्त सोच के दूत, साहसी कर्मठ योद्धा।

जग रोष की आग से जलती, अंधकार के बन्धन,

तोड़ चुका है जज्बातों का जिद्दी जन नायक।


अग्निपथ पर चलने वाले, आत्मविश्वास की गाथा,

उठती हैं ज्ञान की बांधो की अवधारणा।

ज्ञान के प्रहार से भरे उस दारी में,

जीवन की प्रगति का नाटक छोड़ा जाता हैं।


बंधनों के सिलसिले में, आग के रेत सा हैं,

जो जीवन को जला, वो रोशनी हैं।

अंधकार की गहराइयों में भी सजग रहती हैं,

जो सपनों को जगा, वो राही हैं।


चुनौतियों के बंधन में, खुद को जकड़ा रखी हैं,

जो निडरता का प्रतीक, वो लाडली हैं।

बुझती चिंगारी ने उसे नई रोशनी दी हैं,

जो सृष्टि को पुनर्जीवित, वो मधुशाली हैं।


बंधनों की ज़ंजीरों में भी वो स्वतंत्र हैं,

जो आत्माओं को जगाती, वो स्वाधीन हैं।

जीने के मायने को सिखाती हैं वो आग,

जो जीवन को बदलती, वो आग हैं।


जलते रेत के अग्नि में बंधी हैं वो शक्ति,

जो बना देती हैं राहों को पथशाला।

अंधकार के जंजाल में भी वो प्रकाश हैं,

जो आशा के संगीत में गाती माला।


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