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Nirupama Mishra

Abstract


4.5  

Nirupama Mishra

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अंधेरे..कितने चेहरे

अंधेरे..कितने चेहरे

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खोल दी है मैंने

अपने और कई घरों के बंद दरवाज़ों

की सांंकल आहिस्ते से

ये सोचकर कि रोशनी का साथ जरूरी है,


बहुत अंधेरा होता है 

इस अंंधकार मेेंं पता नही चलता

कितने चेेेहरे हैं, किसके चेहरे हैं

ऐसे में घर की चौखट से निकलो 

तो रास्तोंं पर भी अंधेरा ही 

मिल जाता,


मिल जाते हैं अंधेरे में

अनगिनत पैर

नही दिखते जिनके चेेेहरे मगर,


कुछ पैर चलते- भागते

कुछ पैर डगमगाते

जो कि लगते करीब आते

अपनी ही तरफ,


ऐसा एहसास होता अचानक

जैसे कई विषधर चले आ रहे हों

उन पैैरोंं की जगह,


कई दूूूसरे पैैर उन पैरों को 

देख उनकी परवाह नही करते

और बेेफिक्र अपनी राह चले जाते,


और कई पैर तो चुपके से

अपने -आप को महफूज़ रखने के लिए

इधर-उधर जगह तलाशते

लेकिन कोई मेरे डरे -सहमे पैरों के साथ

नही चलता,


शायद घर से ही अंधेरा साथ चल 

रहा होता है इसलिए

ये अनगिनत पैर किसके हैं

नही पहचाने जाते ,


तभी तो आज मैंने घर से निकलते ही

अपने ही नही बल्कि कई घरों की

खोल दी है सांंकल

जिससे रोशनी साथ ही चले घर से

पहचान सकूँ पैरों से लिपटे 

हुए चेहरों की असलियत


और मैं लौटकर आ सकूूँ

अपने घर को सकुशल

बचते हुए अंंधेरों से।


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