अनबनी चांदनी और गौरी का व्रत
अनबनी चांदनी और गौरी का व्रत
अधूरी सी रात का है हाल,
फलक पर बिखरा है उजाल,
पर चांद अभी छिपा हुआ है,
आसमान अनबनी चांदनी से ढका हुआ है।
तारों की मुस्कान है मद्धम,
शीतल हवा का है आलम,
मन में एक इंतजार का गीत,
पर चांद का नहीं कोई संकेत।
गौरी पूजा का थाल लिए
कर रही है।
इंतजार चांद का, मगर चांद छुपा हुआ है।
उसके मन में लग रहा है।
कि मेरे सपने अधूरे, आंखों में बसे,
मन में कई सवाल दबे हैं,
यह रात अधूरी, यह प्रेम अधूरा,
अनबनी चांदनी ने मन को छुआ है।
क्या चांद और चांदनी में अनबन हो गई है?
ऐसी क्या बनी हो गई है
कि चांद निकलता ही नहीं, अपनी चांदनी को चमकाता ही नहीं।
कहीं यह यह संकेत हो अनहोनी का ।
या फिर किसी नई उम्मीद का।
अनबनी चांदनी में छिपा हो राज,
जो खिलेगा आने वाले किसी पल के साथ।
हां देखो चांद खिल गया
चांदनी भी चमक गई चांद की रोशनी में
लगता है दोनों की अनबनी खत्म हो गई साथ में।
गौरी का मुख भी चमक गया है इस विश्वास में।
प्रेम उसका सच्चा है मन उसका अटका है अब पूजा के थाल में।
आवाज लगाती अपने प्रियतम को वह हर्ष उल्लास में।
ताकि वह आकर पूजा करें उसके साथ पूरे प्रेम और पूरे विश्वास में।
चांद के आने से मन में विश्वास बैठ गया है।
गौरी के मन की सारी दुविधाएं दूर हो गई है।
और उसको विश्वास हो गया है पूरा अपने प्रेम में।
