अकेलेपन का सच
अकेलेपन का सच
दर्पण के सम्मुख मैं बैठी,
प्रतिबिंब निहार रही अपना,
बालों की लट को जब देखा मैंने,
उसमें चांदी के तार दिखे,
आंखों की सुर्खी को देखा,
पहले सी उसमें धार नहीं,
चेहरे पर उम्र के जाल बिछे,
होंठों की लाली फीकी थी,
यह सब तो अपने थे,
जिनके साथ रही अब तक,
यह भ्रम पाला था मन में हमने,
यह यौवन के संगी साथी,
यह साथ नहीं छोड़ेंगे मेरा,
हम सब इक दूजे के पूरक हैं,
अंत समय तक साथ रहेंगे,
मेरी बचकानी बातों को सुनकर,
मेरा ही प्रतिबिंब हंसा मुझ पर,
हर व्यक्ति यहां अकेला है,
यह सत्य नहीं जाना तुमने ?
मनुष्य कारवां की चाहत में,
खुद को देख नहीं पाता,
सब कुछ कर लूं मुठ्ठी में,
दुनिया गुण गान करे मेरा,
यह अहंकार ही मानव का,
शत्रु बना रहता हरदम,
कोई साथ न छोड़ेगा,
मैं कभी अकेला न हो सकता,
ऐसी चाहत ऐसी इच्छा,
खुद को धोखे में रखना है,
यहां साथ नहीं देता कोई,
लोगों की बात करें हम क्या?
मनुष्य का जीवन ही नश्वर है,
जो अच्छे कर्म और ईश्वर को,
अपने साथ लिए चलते,
वह जीवन की पथरीली राहों पर,
कभी अकेले न होते,
जन्म मृत्यु के वक्त हमारे,
सम्मुख जो खड़ा सदा रहता ,
वह ईश्वर है सच्चा साथी,
कभी हमें अकेला न करता।।
