अकेलापन
अकेलापन
ये अकेलापन भी,
क्या खूब है---
ना कोई उम्मीद,
ना किसी का इंतज़ार,
बस आप ही आप---
अपने ही साथ !
ना कोई आरजू,
ना कोई जुस्तजू,
ना कोई परेशानी,
ना कोई पशेमानी,
ना दुनिया के झमेले,
ना रंज-ओ- गम के मेले,
बस अपने आप में ही व्यस्त हूँ,
खुश हूँ या त्रस्त हूँ,
ये अकेलापन भी
क्या खूब है---
कभी वरदान है,
तो कभी अभिशाप है,
कहने को दुनिया ये---
बड़ा सा मेला है,
पर इस भारी भीड़ में भी--
हर शख्स अकेला है
अपनी ही दायरों
के अंदर--- गोल- गोल
घूमते -घूमते,
अपने अंजाम तक
पहुंच जाता है---
ये अकेलापन भी
क्या खूब है !
