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Archana Kewaliya

Abstract

3.9  

Archana Kewaliya

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ऐ ज़िंदगी

ऐ ज़िंदगी

1 min
164


रेत की तरह फिसल रही हो क्यों 

बुलबुले की तरह बिखर रही हो क्यों 

शमा की तरह जल रही हो क्यों 

ऐ ज़िंदगी,

थकती नहीं,रूकतीं नहीं हो क्यों 

ग़ैरों की तरह पेश आती हो क्यों 

मुझसे ही तुम अजनबी हो क्यों 

ऐ ज़िंदगी,


आओ दो घड़ी मिल लें  

प्यार के कुछ पल जी लें  

कुछ मीठा सा गुनगुना लें

थोड़ा सा अलसा ले

चंद घड़ी सुस्ता ले

ऐ ज़िंदगी,आओ थोड़ा जी लें !


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