अगर कलम रूठ छाये तो
अगर कलम रूठ छाये तो
अगर कलम रूठ जाती है तो,
कलमकार मायूस बन जाता है।
कलमकार के कोमल दिल में,
गहरी हलचल मचाकर रहती है।
कलम थकान महसूस करे तो,
शब्दों के मोती आंसु बहातें है।
साहित्य का उछलता समंदर,
पलभर में बेकरार बन जाता है।
अगर कलम रूठ जाती है तो,
शब्दों की चमक थंभ जाती है।
कलम के भीतर की स्याही भी,
सुखकर कफ़न बन जाती है।
अगर कलम रूठ जाती हो तो,
कलमकार का दिल तुट जाता है।
कलमकार की कल्पना "मुरली",
जलकर खाक ही बन जाती है।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
