तुम ही मेरा सुकून हो
तुम ही मेरा सुकून हो
मेरे प्यार की बहती सरिता हो,
मेरे धर की अजब शी शान हो,
फिर भी मुझे सताती रहती हो,
ओ सनम तुम ही मेरा सुकून हो।
तुम मेरे बिना नही रह सकती हो,
मुझ को दिल से प्यार करती हो।
फिर भी मुझ पर शक करती हो,
ओ सनम तुम ही मेरा सुकून हो।
बार बार झगड़ा करती रहती हो।
मै समझाउं तो मान भी जाती हो,
फिर भी अचानक चिल्लाती हो,
ओ सनम तुम ही मेरा सुकून हो।
तुम मेरे ख्वाबों की मल्लिका हो,
तुम मेरी मुरादों की वजीरात हो,
"मुरली" बन जाओ आदर्श पत्नि,
ओ सनम तुम ही मेरा सुकून हो।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

