STORYMIRROR

Pari P

Abstract

3  

Pari P

Abstract

अधूरे ख़्वाब

अधूरे ख़्वाब

1 min
267

जुगनुओं की तरह

टिमटिमाते हैं

क़ुछ अधूरे ख्वाब

रात भर,


पानी में झाँकती

चाँद क़ी परछाइयों

क़ो छूने को बेताब

यह रहगुज़र,


उन्मुकत सा है ये

चलता है, गिरता है, 

फिर संभलता है,

नहीं है इसे कल की

कोई फ़िक़र,


हक़ीक़त का सूरज 

पलकों में बंद

उन ख़्वाबों को,

फिर से दिखाता है

उम्मीदों का नया सहर।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract