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Suchismita Behera

Abstract

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Suchismita Behera

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अधुरापन

अधुरापन

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कितनी प्यार से देखी थी ख्वाब

कि क्या क्या करुंगी इस साल

समय के शुरूआत होने के बाद

बिगड़ती गई दिन भर दिन हाल


अकेले रहना अच्छा लगता है

पर इसे शौक़ मे न बदलना चाहुंगी

इस माहोल मे रहकर कुछ और करूं न करूं

अधुरा और अकेले में फर्क ज़रूर ढुंढ पायुंगी


दुर रह गये वो, हम भी तो यहां

वक़्त बहुत है पर गुजारने को वह कहां !

दो पल मिलके सांस भी न लि थी

कि सुरक्षा के लिए पैग़ाम आ गया


अकेले नहीं हैं, पर साथ भी तो नहीं...

ये दस्तक है आगाज़ की अनहोनी ही सही


देखते हें हम भी राह को,

घड़ी देखने का समय कहां ?

इन्तज़ार की मिलन होगी,

ख्वाहिशों का संगम जहां।


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