अदब का पतन
अदब का पतन
नए युग का इस तरह आरंभ हुआ
जानेे कब अदब का पतन शुरू हुआ
चकाचौंध रोशनी मन में अंधेरा करती चली गई
जानेे कब दिखावे की जिंदगी ,जिंदगी बन गई
बड़ों का आदर अपनों का सम्मान सब धरा रह गया
इंसान अपने आप में सबसे बड़ा खुद ही खुदा हो गया
अंग प्रदर्शन को नया चलन दे बेशर्मी से आंख मिलनेे लगी
सरेे राह मिले अजनबी साथ निभाने की रस्म चलने लगी
एहसासों की धज्जियां उड़ रही अपनेपन की बात रह गई
स्वार्थ पर दुनिया टिकी है यही बात एक अमर रह रही
झूठा प्यार,झूठा दिखावा,झूठा मान-सम्मान,झूठा ईमान
अदब का पतन हो रहा अपने ही जाल में जकड़ रहा इंसान।
