ख्वाहिशों का बाजार
ख्वाहिशों का बाजार
1 min
359
एक रात ढली दिन निकला एक एहसास दिल से निकला
गुम हुई थी कहांं अंधेरे में रोशनी बार-बार सवाल निकला
सर पटक कर जो चल पड़ेे थे वीरान राहोंं में हम शहजादे
बहुत हसीन एक ख्वाब आंखों के दरमियान निकला
यू मंजिल की राहोंं में हम खो गए थे एक मुसाफिर बन कर
जानेे कहां से दिल सेे हमारे ख्वाहिशों का बाजार निकला
मचल रहे थे अरमा दिलकश फरमाइश लेकर हम नादान
बेजुबान सी जिंदगी में जाने क्या तूफान अनजान निकला
खो रहे थेे ख्वाबों का सुनहरा सा बवंडर भूल भुलैया में
जब मुड़ कर पीछे देखा तो ख्वाहिशों का बाजार निकला।
