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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

अब मैं बदल गया हूं

अब मैं बदल गया हूं

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लोग कहते हैं 

मैं बदल गया हूं

हंसता मुस्कराता था कभी

अब गुमसुम रहने लगा हूं।

पहले खूब बातें करता था

महफिलों की जान 

हुआ करता था,

सबकी जुबां पे बस

मेरा ही नाम होता था 

भीड़ से अलग मैं 

अपनी पहचान रखता था

और दोस्तों की तो बात ही मत करो

मेरे बिना उनके कदम नहीं हिलते थे

मुझे हरदम साथ लिए चलते थे

जान कहते थे मुझे 

मुझ पे जान भी छिड़कते थे।

पर अब वो कहते हैं

मैं बदल गया हूं 

खोया खोया सा

अपनी धुन में रहने लगा हूं

खुद में सिमटा 

खुद से बातें करने लगा हूं 

शायद वो सच कहते हैं 

अब मैं बदल गया हूं।

वक्त एक सा हो

संभव नहीं.....!

वक्त हर वक्त साथ हो 

ये भी कभी हुआ नहीं...!

वक्त कभी रुका रुका दिखता है 

कभी बेतहाशा भागने लगता है 

इसी वक्त ने वक्त से पहले 

मुझे जीना सिखा दिया

सीधा साधा था मैं 

अब बूढ़ा बना दिया ।

पहले जिम्मेदारियों से भागता था 

अपने में खोया रहता था 

अपनों के दर्द ने 

चोट का अहसास करा दिया 

लड़कपन से

अब जिम्मेदार बना दिया।

पहले खुद के लिए जीता था

स्वार्थ लिए घूमता था 

बस अपने बारे में सोचता था 

दुनियादारी से दूर मग्न

सपने अपने बुनता था

पर कैसे उन्हें बताऊं 

जो दर्द मैंने पाया है 

जो जख्म इस दिल में 

उभर के आया है 

जो टीस लहू सी रिस रही है 

टूटे पत्ते सा हो गया हूं 

इसलिए बदल गया हूं।

पहले मोम था 

नाजुक सा पिघल जाता था 

हर किसी की खुशियों में 

खुश हो जाता था 

पर वक्त की मार ने 

पत्थर मुझे बना डाला 

मुझे मुझमें ही बदल डाला ।

अब कड़ी धूप में चल रहा हूं 

कुछ पाने को जल रहा हूं 

यादों में रोज घुट घुट कर 

रोज घुल रहा हूं 

इसलिए बदल गया हूं मैं।



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