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Mukul Kumar Singh

Inspirational

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Mukul Kumar Singh

Inspirational

आशाएं सदैव जीवित रखना चाहिए

आशाएं सदैव जीवित रखना चाहिए

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समय भी बड़ा कमबख्त है जो जल्द गुजरने का नाम लेता नहीं, ऊबाउपन से बोझिल पलकें भी ठहरने का नाम लेता नहीं। अरे ओ राख अग्नि की लंपटों को क्यूं हर पल धधकने देता नहीं, शायद परिवर्तन आने को आतुर हो। लेकिन वैसे सृजन को उंचे आसन पर बैठाने वाले अपने को भूल जाया करते हैं , पदार्थों के कण पर वो तो लोग बाग कहेंगे कैसे राह में छींटे कीचड़ के पड़ा करते हैं। सोचकर निकला था कि कहीं छूट न जाऊं राह में क्योंकि जब अपनी हीं साया साथ छोड़ देते हैं। जहां लोमड़ी की शह पर शशक सा छलांग न लगाउं,शेर होकर भी खरहे के सामने कुएं में कूदा करते हैं। बेपरवाह होकर भी फासले से परे जाता रहा, जैसे अदालत में सत्य को चीख-चीख कर झूठा बनाता रहा। फिर भी एक आस सी कलेजे में हर लम्हा मशाल को जलाई,गम क्या करना है रात के बाद दिन ने सूरत दिखाई। जब चांद और सूरज सबकी लांछनाओं को दूर फेंक सकते हैं, तो हमारी राह में सदैव आशा का दीप जलाया जा सकता है। जीवन में सफलता की सीढ़ीयां सजती है कड़वी असफलताओं से, हो गया है नील वर्ण भ्रमर निरन्तर सह कर आघात कांटो के। क्षत-विक्षत होता है कोमल हृदय सुन-सुनकर शब्दों की नर्म वाणों को झेलकर,साहस समेटे रहता हूं बार-बार हल्के-हल्के थपकियों से डर डरकर। समझौता करते रहे आई हुई परिस्थितियों से, ताकि अगला भविष्य हमारा हो। जो भी हो पिछे कदम खिंचना कैसा जब पता है कि सामने मौत है, अरे मौत तो आएगी हीं जब आस-पास आंखें तरेरती सौत है। आशा का दीप सदैव जलाते रहना चाहिए,मंजिल पर पहुंचना है तो विषपान करने को तैयार रहने चाहिए। बड़े अरमान से किसी को अपना बनाने वाले ने छलांग लगाई,ये तो वही है जिसने मेरी ओर पग-पग उंगलियां उठाई। फिर भी आप उसे अपना कहते हैं कि शायद अगली बार उसकी उंगलियां न उठेगी,कंटकमय राह में फूल भी बिखरे मिलती है तब भी उंगलियां तो अवश्य उठेगी। न जाने क्यूं हर बार बहल जाते हैं औरों की लच्छेदार बातों से, झूमते हुए पुष्पों पर बहार आते हैं मक्षिकाओं के गुनगुनाहटों से जबकि पुहुप को पता है कि मक्षिकाएं लूटने आए हैं। खगों को भली-भांति ज्ञात है दानों के ढेर में है छिपा विपदाओं का जाल, लोग भले-बुरे को पहचान कर भी विश्वास करते हैं कि परिस्थितियों को लेगा सम्हाल। शिक्षा के सागर में गोते लगा-लगा कर कि मोतियों को पाएंगे, मोती हाथ आकर रज के समान क्योंकि वे अशिक्षितों के आगे एड़ियां बजाएंगे। फिर भी आस कभी न छूटे भले हीं छलावे का शिकार हो, आंधी में क्षुद्र बाती जलती रहती है कि तमस का प्रसार न हो। मान लीजिए मरुस्थल में उंचाई पर दिवाकर एकदम से नाराज है, परन्तु खजूर के हरियाली से आच्छादित मरुद्यान हीं बुझाती गले की प्यास है। प्रतिवाद क्या करोगे जब अपने हीं हमेशा हमें पंक में धकेल दिया करते हैं, सोचकर क्या करोगे जब माता-पिता हीं अपनी संतानों से पक्षपात करते हैं । जीवन को जीना है तो विषपान को तैयार रहना चाहिए, निराशा के बीच आशा का दीप जलाया करना चाहिए। युद्ध में हार-जीत का गहरा संबंध है, परन्तु कैसा युद्ध क्या सीमा रक्षा को वचनबद्ध है। सैनिकों को पता है उनकी मौत निश्चित हीं होगी, फिर भी मन में आस है जीत हमारी हीं होगी। कठिनतर युद्ध तो वो है जहां विपक्षी सभी आपके अपने होते हैं-आसपास एकदम हृदय के निकट होते हैं, बार-बार आघात कांटो के देते हैं। बाहर बड़ी-बड़ी लड़ाईयों में जीतने का दंभ रखते हैं-पस्त कर दिया करते हैं शत्रु को, वहीं अपने हीं प्रिय के शब्दों से फुस्स हो जाते हैं गुब्बारे सा सुई की नोक से कारण अपनों के प्रिय शब्द हृदय को तार-तार कर जाते हैं। अन्दर हीं अन्दर मैग्मा निकलने को आतुर रहती है भू-पृष्ठ को तोड़कर शायद कुछ तो नया करना होगा। अतः लावा को आशा का दीप जलाते रहना होगा। क्या परिवार छोड़ कर पलायन कर पाते, सोचा दायित्व है मेरा तो विपदाओं को देख कर डरना क्या, लड़ाईयां लड़ी हीं नहीं तो कैसे कहें जीत में मजा है क्या। तभी तो कहता हूं आशा का दीप सदैव जलाते रहना चाहिए, क्यूंकि घिरे रहने पर भी साहस से काम लेना चाहिए।     


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