STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

आजकल

आजकल

1 min
580


प्रतीक जीवंत हो उठे हैं

और जीवंतता इतिहास की

तरफ सरक रही है

अजीब दृश्य है

इतिहास उमड़ आया है

और बर्तमान अंतर्ध्यान में है।

परम्पराओं का अंतर्मन

बोझिल हो चला अपने आप से

विश्वास और अविश्वास के बीच

भावनात्मक रेखाएँ

यथार्थ से दूर चली गयी हैं

अब कहीं ठहरें

इस शक्तिकाल में ही

तो आदमी का विश्वास देखिये

देखिये जैसे माँ थी

है नहीं है

आप अनुभव कर सकते हैं

आदमी का विश्वास

अतीत में भी,वर्तमान में भी

विकल्प है

उसके प्रेम में अभिभूत होने का

और उसकी याद में खो जाने का

वो थीं हैं, और हैं तो हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract