आदमी
आदमी
आदमियों को पीरियड नहीं आते,
लेकिन जिम्मेदारियों का लहू
उनके भीतर हर दिन बहता है।
उनके घाव कोई नहीं देखता,
क्योंकि उनके कपड़ों पर
कोई धब्बा दिखाई नहीं देता।
मगर कुछ निशान ऐसे होते हैं,
जो दिखाई नहीं देते—
बस आत्मा पर छप जाते हैं।
वह उम्मीदों का बोझ
हर सुबह अपने कंधों पर लादता है,
दिनभर उन्हें ढोता है,
और रात को थककर भी
अगली सुबह के लिए उठ खड़ा होता है।
वह तब तक चलता रहता है,
जब तक कदम निढाल न हो जाएँ,
क्योंकि उसके रुक जाने से
सिर्फ उसका सफर नहीं रुकता—
उससे जुड़े कई लोगों की
उम्मीदें भी ठहर जाती हैं।
ऐसा नहीं कि उसे दर्द नहीं होता,
ऐसा नहीं कि उसकी आँखों में आँसू नहीं आते,
बस फर्क इतना है कि
वह अपने आँसू पोंछने से पहले
अपनों की आँखों में
उम्मीद तलाशता है।
कभी-कभी सबसे ताकतवर
दिखने वाला आदमी भी
अंदर से बुरी तरह टूट रहा होता है,
लेकिन वह खुद को
उम्मीद हारने की इजाजत नहीं देता।
क्योंकि कुछ लोग
उससे सिर्फ प्यार नहीं करते,
उस पर पूरी तरह निर्भर होते हैं।
इसलिए वह टूटकर भी खड़ा रहता है,
रोकर भी मुस्कुराता है,
थककर भी चलता है…
और
शायद यही एक आदमी की
सबसे बड़ी त्रासदी है—
उसके दर्द का
कोई निशान नहीं होता,
इसलिए दुनिया को
उसके घाव दिखाई नहीं देते।
