हौसलों का परचम
हौसलों का परचम
दूर गाँव की पगडंडी पर
आँखों में सपने पलते थे,
जेब मगर खाली थी उसकी
पर हौसले दिल में चलते थे।
मिट्टी की खुशबू साथ लिए
वो आगे बढ़ता जाता था,
काँटों से भरी राहों में भी
मंज़िल को गले लगाता था।
जिद उसकी कुछ कर गुजरूँ
हालातों से ना हारूँगा,
गिरूँ अगर सौ बार मगर
सौ बार मैं अपने वारूँगा।
न साधन थे,न सुविधाएँ
न कोई बड़ा सहारा था,
बस माँ की दुआ, पिता की मेहनत
और सपनों का सहारा था।
जिस राह में दुनियां ने
उसके
कदम रोकने चाहे थे,
उस राह पर ही उसने
अपने
पदचिह्न गहरे गाढ़े थे।
संघर्षों की भट्ठी में तपकर
कुंदन बन वो आया था,
हर ठोकर से सीखकर उसने
सपना आंखों में सजाया था।
आज उसी के हौसलों ने
नभ में है परचम लहराया,
दूर गांव की छोटी बस्ती ने
अपना नाम है कमाया।
कहानी उसकी कहती है
तूफानों से घबराना मत,
हालात चाहे जैसे हों
सपनों को मरने देना मत।
जिद और लगन सदा
नई कहानियाँ गढ़ती है,
संघर्षों की राह पर ही
इंसान को बुलंदियाँ मिलती है।
जिसके भीतर कुछ कर गुजरने का
विश्वास जिंदा रहता है,
वही अभावों की मिट्टी से
एक नया इतिहास लिखता है।
