आदमी का मरना
आदमी का मरना
प्रिय डायरी,
आदमी मरता है,
मर कर ख़बर बन जाता है।
कभी
हारी बीमारी से,
गाड़ी से कुचले जाने से
भूकंप से
या सैलाब से,
कर्ज़ के
बढ़ते बोझ से
खा पीकर
या भूख से, या प्यास से भी
या बस यों ही उम्र के चुक जाने से!
बात तब चुभती है
जब आदमी मरता है
ज़िल्लत से,
शोषण से
जीने की
या जीते चले जाने की लाचारी से,
बेकारी से
या बदहाली से,
बेरोज़गारी से
या बिना रेज़गारी के
कभी दुख से तो कभी खुशी से भी!
कभी आदमी
मरता है
छत के न होने से,
कभी छत के टूट जाने से
घर ना होने से,
या बेघर हो जाने से
कभी
अकेला पड़ने से,
तो कभी
बंद कमरों में पसरे
अकेलेपन से
कभी
वजह बेवजह
अपने ही मन में पलते डर से !
कभी
मरता है
छत से कूद कर,
तो कभी
पंखे से या पेड़ से झूलकर,
ऐसे मरे या वैसे,
मरना
आदमी का
एक मुद्दा ही तो है !
मर कर
आदमी एक ख़बर बन जाता है
फिर
ख़बर के साथ
बार बार मरता है !
