STORYMIRROR

Swati K

Abstract Others

4  

Swati K

Abstract Others

आभा...

आभा...

1 min
414

अंधियारी राहों में

उम्मीदों के दीप लिए 

ना कांटों की परवाह 

ना दर्द की फिक्र 

बस कुछ ढूंढता बढ़ चला


दूर कहीं टिमटिमाती लौ देख 

लगा पा लिया सब 

पर हवा के झोंकें से

चिराग बुझने लगा 

उम्मीद एक बार 

फिर टूटने लगा


पर व्याकुल मन

दूर आसमां से 

बिखरी लड़ियां बटोर

पिरोए आशाओं की डोर में 

प्रेम की बाती से भींग

दीया जल उठा


उजियारा फिर 

फिजाओं में घुलने लगा

और अपनी "आभा" से 

मुझे रौशन कर गया...

       


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract