21वीं सदी की स्त्री
21वीं सदी की स्त्री
खुद का मान रख कर।
सबका मान बढ़ाती है।
अंधेरों से लड़कर।
उजाले साथ लाती है।
जब कहती है हो जाएगा,कर लूंगी।
शून्य में आकृति नजर आती है।
हर क्षण को
मधुर स्मृति बनाती है।
निराधारों का आधार बन
समझौतों को करारा जवाब देती है ।
नई संभावनाएं ढूंढकर,
जिंदगी को सुबह बनाती है।
पुल बनकर रिश्ते पास लाती है।
दीवारें नहीं छत बनाती है।
संस्कारों से पोषित,
संवेदनशील कहलाती है।
सूरज में ढलकर चांद बन जाती है ।
सूरज बन फिर छा जाती है।
हवा सी गति पाई है।
देर से ही सही,
नारी की बारी आई है।
कविताओं का छंद है नारी।
हर राग में मुखरित नारी।
वक्त पर वक़्त सम्भालती है।
बस ऐसे ही खुशियां बांटती है।
कहानी का कथ्य है नारी।
बिन इसके बेजान जिंदगी सारी।
चौखट के अंदर हो या बाहर,
खुशियों को सजाती नारी।
पिंजरे का पंछी नहीं,
खुले आसमान का परिंदा है।
आह से आहा के सफर में
अस्तित्व निखरा है।
दूर जाती है पर दूर रहती नहीं
अपनों से कभी रूठती नहीं ।
घर की छांव बन
कड़ी धूप भी हंसकर सहती है।
नारी तुझे प्रणाम।
भरती विश्वास
तेरे अधरों की मुस्कान।
