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Madhu Vashishta

Action Classics Inspirational

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Madhu Vashishta

Action Classics Inspirational

धन्यवाद टीचर (स्कूल की यादें)

धन्यवाद टीचर (स्कूल की यादें)

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उम्र के इस दौर में जबकि हमारे बच्चे भी स्कूल से निकलकर अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ा रहे हैं तो इस विषय की प्रतियोगिता ने खुद को बहुत समय पीछे एक टीचर की याद दिला दी। इस कहानी के माध्यम से मैं अपने स्कूल की टीचर का धन्यवाद करती हूं।

बात उस समय की है जब पांचवी क्लास से मैं छठी क्लास में आई थी पांचवी क्लास तक छोटे स्कूल में थी और छठी क्लास में नए और बड़े स्कूल में दाखिला लेना था। उस समय दिल्ली के हायर सेकेंडरी स्कूल में मेरा एडमिशन हुआ। इस कारण मैं उस स्कूल में किसी को भी नहीं जानती थी। उस स्कूल के पुराने बच्चे एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे। वैसे भी छोटे स्कूल के बाद बड़े स्कूल में जाने में मैं पहले ही बहुत घबराई हुई होती थी और दूसरी लड़कियों से अपने खुद में ही सीमित रहने वाले स्वभाव के कारण दोस्ती नहीं कर पा रही थी। हर लड़की अपनी सहेली के साथ ही बैठना चाहती थी इसलिए पहली लाइन से दूसरी और दूसरी से तीसरी होते होते मुझे सबसे आखिर की लाइन में सीट तक भेज दिया गया।

उस पीछे की लाइन में बहुत बड़ी-बड़ी लड़कियां बैठती थी जोकि पिछली क्लासों की फेलियर ही थी। एक तो वैसे भी क्लास में मेरा मन नहीं लगता था इस कारण पढ़ाई में भी कुछ ज्यादा समझ नहीं आता था। यहां तक भी सब सहन हो जाता लेकिन बड़ी मुसीबत तो तब आनी शुरू हुई जब पढ़ने के लिए मैडम किताब निकालने को कहती तो उस विषय की किताब मेरे पास में ही ना होती। ना ही किताब मेरे घर में मिलती। घर में भी डर के मारे मैं मम्मी को अपनी किताबें खोने के विषय में नहीं कहती थी।

  स्कूल में कभी बिना किताब के जाना ,अगर मैंने होमवर्क किया भी होता था तो स्कूल में होमवर्क वाले सब्जेक्ट की कॉपी नहीं पाती थी। इस तरह से किताब कॉपी के खो जाने से रोज क्लास में डांट पड़ना या टीचर द्वारा मुझे क्लास से बाहर निकाल देना एक आम बात हो गई थी। पढ़ाई में मेरी गिनती नालायकों मैं होनी शुरू हो गई थी।

 मुझे स्कूल में खर्ची के मम्मी कुछ पैसे देती थी। कॉपी और किताबों के खोने पर क्योंकि मैं मम्मी को नहीं बताती थी तो मेरे साथ में बैठने वाली बड़ी लड़की राजरानी मेरे से वह खर्ची के सारे पैसे लेकर कभी कोई सेकंड हैंड किताब ला देती थी और कभी पतली सी कॉपी। जिसमें कि मैं होमवर्क करके मैडम को दिखा तो देती थी पर हमेशा डांट मिलती थी कि इतनी पतली कॉपी क्यों इस्तेमाल करती हो? मम्मी के दिए हुए पैसों से मैं कभी कुछ खरीद नहीं पाई बल्कि सारे पैसे किसी ना किसी चीज की कीमत के रूप में मुझे राजरानी को ही देने होते थे। धीरे धीरे हाल यह हो गया कि मम्मी द्वारा रखा हुआ बढ़िया लंच भी वह ही खा जाती थी।

  छठी क्लास में भूखी प्यासी रहने के कारण (क्योंकि मैं घर से अक्सर बिना कुछ खाए ही निकलती थी) मैं बहुत कमजोर और बीमार हो गई थी। कई बार तो मैं स्कूल में ही चक्कर खाकर गिर जाती थी।तिमाही और छमाई पेपरों में मेरे बहुत गंदे नंबर आए थे। मम्मी और पापा के बहुत प्यार से समझाने पर मैं हमेशा कोशिश करती थी कि मैं पढ़ूं और अच्छे नंबर लाऊं लेकिन कुछ डर ही ऐसा बैठ गया था कि पढ़ाई करना शुरू करते हैं स्कूल के टीचरों के द्वारा दी गई सजा और क्लास की लड़कियों के द्वारा किए गए उपहास का ही ख्याल आता रहता था। फाइनल पेपर से पहले दिसंबर वाले पेपर की तैयारी करने के लिए मम्मी ने भी मेरा बहुत ज्यादा ख्याल रखना शुरू कर दिया था। 

स्कूल में सिर्फ एक संस्कृत की टीचर थी जो सब बच्चों को बहुत प्यार करती थी वह मुझे भी नालायक नहीं समझती थी बल्कि और बच्चों के जैसे ही वह मेरे साथ भी व्यवहार करती थी। उनकी नजर में मैं भी गिरना नहीं चाहती थी इसलिए संस्कृत का सारा होमवर्क भी करती थी और उनका बताया हुआ याद भी। एक दिन उन्होंने ज्यादा होमवर्क दिया और मैंने घर में रात तक बैठकर के सारा होमवर्क करा था। दूसरे दिन जब कॉपी चेक कराने की बारी आई तो मेरी कॉपी बैग में थी ही नहीं। हालांकि मैंने सवेरे स्कूल में आने के बाद उसे देखा था। मैडम के पूछने पर तुमने होमवर्क नहीं करा क्या? मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैंने रोते-रोते मैडम को कहा मैडम सच्ची "आप की कसम" से मैंने होमवर्क किया था। और मैं कॉपी भी लाई थी। आप विश्वास तो कीजिए!

 जाने उस दिन मेरे कहने के लहजे में कुछ था या मैडम वास्तव में ही बहुत ही अच्छी थी। उन्होंने मुझ पर विश्वास करा, मुझे प्यार से अपने पास बुलाया और कहा, हां मुझे पता है कि तुमने होमवर्क करा होयेगा क्योंकि तुम तो हमेशा ही करके लाती हो। कॉपी तुम लाई थी तो गई कहां? उस दिन उन्होंने कहा सारे बच्चे अपनी होमवर्क की कॉपी मेरे पास रख दो। आज पढ़ाई नहीं होगी पहले मधु की कॉपी ढूंढो। बैग अपनी जगह पर ही रहने दो। और उन्होंने मॉनिटर्स की ड्यूटी लगाई हर बैग में कॉपी देखें कि कहीं मधु की कॉपी किसी बैग में ना हो।

ढूंढते ढूंढते सच में ही मेरी कॉपी मेरे साथ वाली लड़की राजरानी के बैग में मिल गई। तब मुझे पता पड़ा कि वह चोर थी और मेरी सारी कॉपी और किताबें उसी के द्वारा ही चुराई गई थी। मैडम ने उसे डांटा और मेरी सीट बदल कर सबसे आगे अपने सामने कर दी। उसके बाद तो मानो मेरी जिंदगी ही बदल गई धीरे धीरे सब मुझसे बात भी करने लगी थी और क्योंकि अब मेरी कॉपी या किताब चोरी नहीं होती थी तो मेरा होमवर्क भी पूरा रहने लग गया। क्योंकि मैं आगे बैठती थी इसलिए हर टीचर में भी मेरे ऊपर में ज्यादा ध्यान दिया। टीचर्स के कहने पर क्लास के मॉनिटर में भी मेरी हर कॉपी को पूरा करवाने में अपना अपना योगदान दिया।वह स्कूल जिसमें मुझे जाना भी अच्छा नहीं लगता था अब मुझे वहां जाना भी अच्छा लग गया था और मेरा अब पढ़ने को भी मन लगने लगा था।

 संस्कृत वाली मैडम मेरा बहुत ख्याल रखती थीं। शायद उन्होंने मेरी और मैडम से भी बात की होगी क्योंकि सभी टीचर्स का व्यवहार मेरे प्रति बदल चुका था। उस दिसंबर वाले इम्तिहान में मेरे नंबर तिमाही और छमाही इम्तिहान की अपेक्षा थोड़े से ज्यादा आए थे।

2 महीने बाद ही मेरे फाइनल इम्तिहान थे फाइनल इम्तिहान के बाद जब रिजल्ट सुनने जाना था तो मुझे अपने पास होने की भी उम्मीद कम थी।रिजल्ट सुनने अपने पापा के साथ मैं डरती डरती स्कूल गई थी, लेकिन पाठक गण विश्वास कीजिए मैं बहुत अच्छे नंबरों से पास हुई थी।

 उसके बाद मेरे पापा का भी तबादला हो गया था और हम दूसरे मकान में आ गए थे। सातवीं क्लास में मैं दूसरे स्कूल में गई थी वहां तो हमारी सरकारी कॉलोनी थी और वहां पर मेरी बहुत सी दोस्त भी बन गई थी। मैं छठी क्लास में सिर्फ 1 साल ही उस स्कूल में रही और उन संस्कृत की मैडम से मेरा उतना ही वास्ता रहा पर आज तक भी मैं उन मैडम को नहीं भूली। शायद कभी भूलूंगी भी नहीं।

अपनी कहानी सुना कर हमेशा मैंने अपने बच्चों को और उनके भी बच्चों को यही सिखाया कि कुछ भी हो जाए कभी भी कोई बात अपने माता-पिता से मत छुपाना। कोई भी कॉपी किताब या कुछ भी खोने पर मेरे बच्चे हमेशा मुझे बता देते थे। आज भी मुझे महसूस होता है अगर वह संस्कृत वाली मैडम नहीं होती तो शायद मेरे में उतना आत्मविश्वास नहीं होता और मैं शायद वह नहीं होती जो आज हूं। टीचर्स डे की हर टीचर को शुभकामनाएं। इस उम्मीद के साथ मैं यह कहानी खत्म करती हूं यह हर बच्चे को मेरी संस्कृत की मैडम जैसी टीचर मिले। और हर टीचर भी ऐसे बने, आज मैं सर्विस से रिटायर होने के बाद में भी टीचर का नाम आते ही आंखों के सामने वही आती हैं।


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