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अब पछताए होत क्या !
अब पछताए होत क्या !
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© Shailaja Bhattad

Drama

2 Minutes   7.7K    41


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हमारे अपार्टमेंट में सप्ताह में एक दिन एक सब्जीवाला व फलवाला आकर दो बजे से 9 बजे तक अपना बाजार लगाते हैं। वे बहुत ही किफायती दामों में बेचते हैं।

इनके दामों में और बाहर के दामों में जमीन आसमान का अंतर होता है। भिंडी अगर बाहर 20 रुपये पाव है तो ये 30 रुपये किलो देते हैं। 2 बजे से सारी महिलाओं का उसकी दुकान पर ताता लग जाता है और सभी सप्ताह भर का सामान खरीद लेती हैं। इस तरह सभी को बहुत मुनाफा होता है। लेकिन जैसा की मनुष्य प्रकृति से ही असंतोषी है और कईयों का शक करना आदतन होता है। कुछ महिलाओं ने सब्जी वाले को ताना देना शुरू कर दिया । क्या भैया कितनी महंगी सब्जी देतो हो बाहर तो इससे भी सस्ती मिलती है।

ऐसा हर सप्ताह होने लगा। कई बार महिलाओं ने झिड़कियाँ भी दी। जो वो खून का घूँट पीकर रह गए।

लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तो उन्होंने सीधे सीधे कह दिया। बहनजी जब हमारे यहाँ सभी कुछ बहुत महंगा है तो फिर आप आती ही क्यूँ हैं। बाहर से ही क्यूँ नहीं खरीद लेती।माफ कीजिएगा आप हमारे यहाँ से सब्जियाँ नहीं खरीद सकती। वे महिलाएँ अनपेक्षित प्रतिक्रिया पाकर सकपका सी गई। लेकिन अब क्या उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा । ज़रूरत से अधिक लालच करना उन्हें महँगा पड़ा ।

"लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत !"

Satire Vegetable vendor Society

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