बुआ का घर
बुआ का घर
"माँजी! मैं सोच रही थी कि हम लोग शाम को जब एकता दीदी के घर जाएंगे, तो मैं अपने भाई राजू से मिलते हुए वहां आ जाऊंगी। उसका एक्सीडेंट हुआ तो भी नहीं गयी और बुआ की भी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं तो सोचा मिल लूंगी" राधिका ने अपनी सास गीता जी को नाश्ता पकड़ाते हुए कहा।
गीताजी- "देखो! बहु तुम्हारे खानदान में तो कभी कोई तो कभी कोई या तो बीमार रहता है, कभी एक्सीडेंट हो जाता है, कभी शादी कभी कोई फंक्शन हमेशा लगा ही रहता है इतना बड़ा संयुक्त परिवार जो है, लेकिन मैं हर किसी के लिए तुम्हें हाँ तो नहीं कर सकती। ऐसे हर किसी के फंक्शन में तुम जाने लगी तो पता चला सालभर तुम मायके की रिश्तेदारी ही घूम घूम कर निभाओगी, और राजू कौन सा तुम्हारा सगा भाई है, तुम्हें पहले भी कहा था आज फिर से कह रही हूँ अब बुआ मामा मौसी के रिश्ते भूल जाओ, दूर के रिश्तेदार है तो मायके जाकर दूर की रिश्तेदारी निभाते रहना लेकिन यहाँ से नहीं"।
गीता जी के पास बैठे राधिका के दोनो बच्चें बेटी शानू, बेटा रोहित सब सुन रहे थे। और अपनी मां की आंखों में आये आंसू भी देख रहे थे, लेकिन चुपचाप थे।
राधिका को जवाब पता था अपनी सास का लेकिन करती भी क्या जब अपना पति ही साथ ना दे तो, शादी के बाद तो राधिका के मायके से जुड़े रिश्ते लगभग सब छूट ही गए थे, राधिका एक संयुक्त परिवार की लड़की थी जिसकी शादी एकल परिवार में कर दी गयी थी जिसमें रिश्ते के नाम पर सिर्फ़ सास ससुर, पति एक देवर और औऱ एक ननद थी।
राधिका की बुआ राधिका को अपनी बेटी की तरह मानती थी क्योंकि उनके कोई बेटी नहीं थी लेकिन गीता जी के व्यवहार से एक ही शहर में रहने के वावजूद उन्होंने राधिका के ससुराल मिलने आना छोड़ दिया था वो समझती थी इसलिए उन्होंने राधिका को ही कह रखा था जब भी समय मिले आ जाया करना।
शाम को जब सब तैयार हो रहे थे दोनो बच्चें जिद पर अड़ गए, दादी हमे बुआ के घर नहीं जाना, राधिका के बहुत समझाने पर दोनो बच्चें तैयार होकर एकता के ससुराल उसके बेटे राहुल के जन्मदिन की पार्टी में गए। वहाँ जाकर शानू और राहुल चुपचाप एक जगह बैठे थे, सबके बुलाने पर भी वो दोनो पार्टी के किसी भी गेम या डांस में भाग नहीं कर रहे थे।
ये देखकर गीता जी ने कहा"तुम दोनो ऐसे क्यों बैठे हो, क्या हुआ आज तुम दोनो को, शानू ये लो बेटा गिफ्ट जाकर राहुल भैया को दे दो और हैप्पी बर्थडे कह कर आओ, "
तभी तपाक से रोहित ने बीच मे अपनी दादी को टोकते हुए कहा"दादी!शानू का भाई मैं हूं राहुल नही, राहुल उसका रिश्तेदार और मैं उसका भाई हुँ, शानू तुम मत जाना वरना तुमको भी तुम्हारी सास डाँटेगी शादी के बाद जैसे मम्मी को पड़ती है, दादी से"
शानू-"हाँ!भैया मैं नहीं जाऊंगी आपने ठीक ही कहा राहुल मेरा भाई नहीं, ये लो दादी अपना गिफ्ट आप ही दो मैं नहीं दूँगी"पास बैठी एकता की सास उमा जी और एकता की ससुराल के बाकी लोग दोनो बच्चो की बात सुनकर अवाक रह गए।
राधिका ने बीच बचाव करते हुए कहा"शानू, रोहित ऐसा नहीं बोलते बच्चों राहुल तो आपका भाई है।"
रोहित -"माँ अगर राहुल हमारा भाई है तो राजू मामा भी तो आपके भाई ही है ना, फिर दादी उनको आपका रिश्तेदार क्यों कहती है, उन्होंने क्यों मना किया आपको उनके घर जाने और उनसे मिलने से।"
सब निरुत्तर बच्चो की बातों को सिर्फ सुन रहे थे तब उमा जी ने कहा"गीताजी ये क्या बात हुई, आपने राधिका को क्यों नहीं जाने दिया, दुःख तकलीफ में रिश्तेदार या अपने काम नहीं आएंगे तो कौन काम आएगा? "
गीताजी-"अरे!क्या बताऊँ बहन जी ये बच्चे भी ना कभी भी कोई भी मनगढ़ंत कहानी बना देते है" ।
उमाजी ने बच्चो को बुलाकर पूछा कि क्या बात है तो उन्होंने पूरा सच उनको बता दिया तब उन्होंने कहा "गीताजी पहली बात बच्चे कभी झूठ नहीं बोलते, जबतक कि उनसे झूठ बोलने के लिए ना कहा जाए। बच्चे कुछ भी गलत नहीं कह रहे, बच्चे तो जैसा देखते सुनते है वैसा ही कहते है और करते है।"
राधिका के साथ इस तरह का बर्ताव करना गलत है सोचकर देखिये कि आज़कल तो लोग एक ही बच्चा रखते है तो जब हम इस तरह से रिश्ते खत्म कर देंगे तो बच्चे इन रिश्तों की खूबसूरती और महत्व को कैसे समझेंगे।
गीताजी को एहसास हो चुका था और बच्चों की बातो से सीख भी मिल चुकी थी ।जन्मदिन की पार्टी करके गीताजी पूरे परिवार के साथ राधिका की बुआ के घर उन से मिलने गयी, सब गीले शिकवे भूलकर उनके बेटे बहु ने इनलोगो का आदर सत्कार बहुत अच्छे से किया।
घर आकर गीताजी ने राधिका से कहा"बहु आज बच्चों ने बहुत अच्छे से मुझे सिखा दिया कि मैं गलत थी, हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।"
राधिका-"नहीं माँजी आप मुझसे बड़ी है आप माफी मत मांगिए मुझे तो बस इस बात की खुशी है कि देर से ही सही आप बच्चों की बातों से नाराज होने की बजाय आपने उसे समझा और सही फैसला लिया।"
