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खाली डिब्बा
खाली डिब्बा
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© Amar Adwiteey

Drama

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चुटियल आज बहुत खुश है। वर्ष में गिने चुने ही ऐसे अवसर आते हैं जब उसे बिना मेहनत किये कुछ प्राप्त होता है। दीपावली पर आस पड़ोस और अन्य जान पहचान के लोगों से मिलने वाले मिठाई के डिब्बों को देखते ही खुशी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। सभी प्रकार के डिब्बे मिलते हैं। कुछ बहुत छोटे तो कोई मिश्रित मिष्ठान से लबालब भारी डिब्बा। पिछली दीपावली पर यह संख्या दो अंकों को पार कर गई। इस बार निश्चित ही एक दर्जन डिब्बे जरूर मिलेंगे।

वह मन ही मन खूब खुश हो रहा था कि तभी उसे अपने लँगोटिया यार फोकट की याद आ गई। लेकिन यह क्या, विचार करते हुए वह तुरंत काँप-सा गया। वह बड़बड़ाने लगा। 'नहीं, नहीं, इस बार ऐसी गलती नहीं करनी है।' यह रटते हुए, वह ठिठकाव से आगे बढ़ गया। 'काश मैं उस दिन ही फोकट से वह बात पूछ लेता !'

फोकट और चुटियल मित्र होने के साथ-साथ, एक ही जगह पर काम करते हैं। इस प्रकार, उन्हें कुछ अन्य लोगों से मिलने वाली मिठाई के अतिरिक्त अपने फैक्ट्री मालिक से मिठाई और तोहफे एक साथ और एक जैसे ही मिलते हैं। ऐसा ही पिछली दीपावली पर हुआ। दोनों को बोनस स्वरूप कुछ रुपये, गिफ्ट और मिठाई मिली। उन दोनों ने अपने परिवार के साथ अतिरिक्त छुट्टी का आनन्द उठाया और हँसी-खुशी उत्सव मनाया।

दीपोत्सव के दो दिन बाद प्रथम कार्यदिवस पर छुटपुट लोग ही काम पर लौटे। कुछ लोग अभी मिठाई पचा रहे थे। उस शाम को, मालिक ने सुपरवाइजर द्वारा उपस्थित लोगों को एक-एक मिठाई का डिब्बा और थमा दिया। कुछ लोगों के होठ फैलकर दो से ढाई इंच के हो गए और फिर, सब ने अपने अपने घर का रास्ता पकड़ लिया।

टेम्पो स्टैंड पर फोकट ने अपना झोला थोड़ी देर को चुटियल को पकड़ने को दिया तो चुटियल को लगा कि उसमें टिफिन और मिठाई को मिलाकर जो भार होना चाहिये, वह नहीं है। खैर, उसने बात टाल दी। अगले दिन नाश्ते के साथ उसने मिठाई के कुछ पसंदीदा पीस पेल दिए, ऊपर से हाजमोला की दो गोलियाँ लीं और अपनी पत्नी को भी इसे जल्द खपाने का आदेशात्मक संकेत करते हुए फैक्ट्री के लिए निकल पड़ा।

हालांकि न तो किसी ने छींक मारी थी और न ही कोई बिल्ली उसका रास्ता काटकर निकली, फिर भी वह अनमना महसूस कर रहा था। इसी ओझल मन से वह फैक्ट्री पहुँच गया। शायद उसे इतनी ही छूट दी गई थी। काम की वर्दी बदलने के समय उसे लगा कि पेट मरोड़ मार रहा है, उसे संडास को जाना चाहिए। और फिर जब वह संडास गया तो अगले घंटे तक आता जाता ही रहा, मानो वह कोई नया एक्टर हो, ठीक से अपना शॉट नहीं दे पा रहा हो और निर्देशक बार बार 'कट' और 'रिपीट' बोल देता हो।

संडास से निवृत होकर वह फोकट से मिला और जिज्ञासा कर पूछा कि क्या उसने कल वाली मिठाई नहीं खाई। फोकट के चेहरे पर न कहने के भाव से उसकी जिज्ञासा बढ़ गई। तब फोकट ने बताया कि वह तो मिठाई लेकर ही नहीं गया था। अब चुटियल चुप कैसे रहता। 'लेकिन मैंने तुम्हारे थैले में डिब्बा देखा था, वह ?' 'अरे भाई, खाली डिब्बा था, मालिक देखते तो नाराज न हो जाते। मिठाई तो खुद जंभाई ले रही थी चार दिन से !'

मिठाई दिवाली डिब्बा खाली तबियत

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