गोष्ठी

गोष्ठी

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मुझे कई लोगों ने घेर रखा है और सभी अपनी पसंद का कुछ न कुछ खिलाने की शर्त पर अड़े है। किन्तु यह क्या, शर्मीले जी मेरी शर्ट की कॉलर पकड़कर कोई पकवान मेरे मुँह में ठूँस रहे है। भला यह कैसा सेवाभाव है?

   

मैं भड़भड़ा कर उठ गया और लगा कि जान बच गई (या कह लो कि जान छूटी!)। यह भी अजीब बात रही कि इतने भड़भड़ा देने वाले सपने के टूटने पर भी शरीर सामान्य था, धड़कन और तापमान भी। बिस्तर छोड़कर, बाहर खुले में घूमने के बाद वह क्रिया की जो सपने टूटने और पुनः सोने के मध्य सभी लोग करते है। लघुशंका निवृत्ति।


तभी छोटी लाइन से ट्रेन गुजरने की ध्वनि सुनाई दी। विचार हुआ कि समय तो ब्रह्ममुहूर्त होने का लग रहा है और यह आवाज आधी रात की पैसेंजर की लगती है। आज यह गाड़ी फिर बहुत लेट हो गई। बड़ा बुरा हाल है, लोग अपने मतलब के लिए मनमाफिक चैन खींचते है और अन्य सभी को नुकसान पहुंचाते है।


इसी विचार के साथ बिस्तर पर पहुँचा तो अनायास घड़ी देख ली। अरे, यह क्या! अभी तो दो बजे है। यानी पैसेंजर लगभग सही चल रही है। ( यहाँ लोग रात पौने दो बजे की पैसेंजर ट्रेन को आधी रात की पैसेंजर बोलते है) इसका मतलब सपने देखने और बाहर हो रही रिमझिम बारिश के प्रभाव से मुझे प्रभात बेला का आभास हुआ था। 'अभी रात बहुत बाकी है, मुझे सोना चाहिए।' ( जैसे कि ऐसा सोचने से नींद आ जायेगी ) काफी समय बिगाड़कर भी नींद नहीं आयी। फिर लिखने बैठ गया जिसे आप पढ़ रहे है।


हुआ यूँ कि बीती शाम को एक गोष्ठी में शामिल हुआ जहाँ साथियों ने कुछ लम्बी कवितायें और कुछ लघु कथाएं प्रस्तुत की। प्रस्तुति देने, तालियाँ बजने और फिर अगले व्यक्ति का नाम बताने का क्रम जारी था। गोष्ठी समापन की ओर बढ़ रही थी। तब बागड़ जी ने एक कविता पढ़ी, उसकी शैली अज्ञेय जी वाली किन्तु व्यंग्य का पुट परसाई जी वाला। अब इसे कविता की सटीकता कहें या सभा की मजबूरी, एक बार तालियाँ बज गईं। किन्तु कुछ मित्र त्योरियां चढ़ाकर अकड़े हुए दिखे। मुझे कोई प्रसंग खास लगा था तो प्रशंसा कर दी। फिर क्या था, जो लोग बागड़ जी द्वारा प्रस्तुत तीखे व्यंग्य को व्यक्तिगत रूप से लेकर तमतमाये थे लेकिन कविता की उत्कृष्टता के चलते उनसे बहस करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे, उन्होंने मेरे कंधों पर अपनी बन्दूकें रख दी।


हमारे यहाँ, कुछ विषयों पर राय देने की योग्यता सभी लोग रखते है। ठीक उसी प्रकार जैसे सार्वजनिक स्थान पर कोई दुर्घटना, छेड़छाड़ या आपसी झगड़ा होने पर विषय व स्थिति की जानकारी वगैर कोई भी नागरिक स्वयं पुलिस, वकील और कोई तो जज बन जाता है। उदाहरण स्वरूप, क्रिकेट का खेल, कैंसर का इलाज, संसद, विधानसभा, गाय, राम, गंगा नदी आदि इत्यादि। बहती गंगा में डुबकी लगाने का मौका कौन छोड़ता है। 


हम दोनों को लोगों ने इस प्रकार से घेरने का प्रयास किया जैसे बागड़ साहब ने कविता न सुना कर किसी की कुंडली सार्वजनिक कर दी हो। शुरुआत में, मैंने कविता पर प्रशंसात्मक टिप्पणी की परंतु तब उस बिंदु की गहराई से परे था लेकिन जैसे जैसे विरोधियों ने अपनी बात को पुष्ट करने हेतु उसकी आलोचनात्मक विवेचना की, मैं उसके निकट होता गया और एक बार लगा कि यह कविता मेरे मन में ही उगी है और इस अग्रज कवि ने इसे बेहतर शब्दों में पेश किया है।


गोष्ठी के बाद, भोज का प्रबन्ध था। मैंने निमंत्रण मिलने के समय ही आयोजक महोदय से निवेदन कर दिया था कि मैं भोजन ग्रहण नहीं कर पाऊँगा अतः सभाकक्ष से ही विदा लेना उचित होगा। मेरी बात को समझते हुए आयोजक इस पर सहमत हो गए थे लेकिन बहस में बागड़ दादा के साथ खड़े होने के कारण स्थिति बदल गई। बातें करते हुए उन्होंने दोस्ताना लहजे में मेरा हाथ पकड़ा और भोजन पांडाल तक ले गए।


लोगों की समझ बड़ी भिन्न और विचित्र होती है। कुछ लोग समझते है कि व्यंग्य की बात उन्हे एक बार में ही समझ आ जाती है, उसमे विचारने लायक कुछ नहीं होता और कुछ अन्य लोगों को श्रृंगार रस की कविता भी कई बार में बूझती है।

वहाँ की परिस्थितियों के मद्देनजर, कुछ लोग (आयोजक व बागड़ जी आदि) सहमत थे कि भोजन ग्रहण न करना व्यक्तिगत विषय है जो कि पूर्व घोषित भी है, वहीं कुछ अनभिज्ञ लोग समझ रहे थे कि बहस एकतरफा थी तो संभवतः मैं अनावश्यक रूप से दबाव बनाने से नाराज हूँ। लेकिन असल में, एक समूह था जो न तो गोष्ठी में कविता के सृजक से बहस करने में सक्षम दिखा और न ही उनके व्यक्तित्व के चलते उनका मजाक उड़ा सकता था और वे यहाँ भी, मुझसे परिचित होने का लाभ लेकर अपनी तोपों के लिए मेरे कंधों का इस्तेमाल कर रहे थे।


बड़ी लाइन से गुजरती हुई ट्रेन लगातार सीटी दे रही थी, घड़ी देखी तो चार बजने वाले है। हो न हो यह हरिद्वार एक्सप्रेस हो, यह सोच ही रहा था कि श्रीमती जी ने, जो इस बीच दो बार मुझे विनम्रता से सो जाने का आग्रह कर चुकीं, चेतावनी जारी की। मैंने झटपट सब सामग्री समेटकर टेबल पर सरकाई और लाइट बन्द कर सोने के असफल प्रयास में लेट गया।


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