पटरानी का महल

पटरानी का महल

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बात पुरानी है। पुरानी ही नहीं, पिछले जन्म की। जब मैं किशोरावस्था में था, एक दिन पिताजी के दादा जी और उनके साथ मैं, घोड़े पर सवार, एक सूबेदार (एक तहसील के राज्य-प्रतिनिधि) के शपथ ग्रहण समारोह में सम्मिलित होकर लौट रहे थे कि आधे रास्ते में हमारा घोड़ा अस्वस्थ हो गया। वहाँ से हमारा निवास बीसों मील दूर था जबकि वहाँ के क्षेत्रीय राजा का महल एक कोस। दादा जी ने वहाँ से मदद लेने का विचार किया और हम महल के मुख्य द्वार पर पहुँच गए। वहाँ दादा जी ने अपनी विनती को राजा तक पहुंचाने का आग्रह किया। द्वारपालों ने बात को अधिक गंभीरता से न लेते हुए कहा, 'आप लोग द्वार से एक फर्लांग दूर इंतजार करो और संदेश का उत्तर तुम्हें बता दिया जाएगा।'

तब, दादा जी ने राजा की दादी माँ से अपने कुटुंब की रिश्तेदारी होने की बात कही तो प्रक्रिया में गति आ गई और हमें द्वार से बाहर के बजाय भीतर के प्रांगण में विश्राम करने को कहा। शीघ्र ही हमें भवन के बरामदे में बुलाकर अतिथि की औपचारिकता पूरी की गई। 

राजा की दादी माँ अब जीवित नहीं थीं। वैसे राज परिवार के समक्ष हमारे कुटुंब की हैसियत न तो तब कुछ खास थी और न ही अब, किसी सामाजिक कार्यक्रम में संयोगवश उनकी ( दादी माँ की) सुन्दरता, विवेक व साहस का परिचय हो गया था और राजा ने एक तरफ़ा निर्णय कर उनसे विवाह किया। 

दादा जी वहाँ उपस्थित अनेक रसूखदार लोगों के साथ हुक्का पानी में व्यस्त हो गए और मुझे राजा की तरफ आमुख हो महल में घूमने की अनुमति दे दी। एक और बात यह हुई कि राजा जी ने मुझे निकट बुलाकर, अंगरक्षक को निर्देश दिया कि बच्चे को पटरानी वाला महल अवश्य दिखायें, शायद इसलिए कि उनकी दादी माँ उनके दादा जी (जो कि एक बड़े क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे) की पटरानी रही थीं। चलन के अनुसार, इस समय भी कई रानियाँ थीं और पटरानी का रुतबा अन्य रानीयों से बड़ा होता था। मैं महल के भीतर पहुँच गया।

वह अंगरक्षक महल के भीतर नहीं जा सकता था अतः उसने सारी बात द्वारपाल को बताई। वहाँ एक अप्रत्याशित बात हुई। द्वारपाल ने पूछा कि इसे कौन सी पटरानी का महल देखना है? मैं और वह अंगरक्षक दोनों आश्चर्यचकित हुए क्योंकि हमने कई रानीयों के बीच एक पटरानी वाली बात ही सुनी थी। द्वारपाल ने आगे बताया कि पिछले राजा साहब के समय इस विषय पर कुछ विवाद हुआ था तब से पटरानी का कार्यकाल चक्रीय कर दिया गया है और उसकी अवधि सर्वसम्मति से तय कर दी जाती है। हम सब इस निष्कर्ष पर पहुँचे ही थे कि मौजूदा पटरानी का निवास ही पटरानी का महल होना चाहिए वहीं का भ्रमण करते हैं, मेरे दादा जी का, वहाँ से रवानगी का बुलावा आ गया और मुझे पटरानी का महल बिना देखे ही लौटना पड़ा।



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