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ashok kumar bhatnagar

Inspirational

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ashok kumar bhatnagar

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एक सैनिक का रक्षा बंधन

एक सैनिक का रक्षा बंधन

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  मैं हवलदार राम बहादुर आर्मी की इन्फेन्ट्री बटालियन में हूँ। एक साल तक सियाचिन में रहा और लगभग एक महीने पहले मेरी कम्पनी बारामुला में आयी हैं। मेरी ड्यूटी सियाचीन में भी बहुत मुश्किल थी।   


सियाचिन में भारतीय जवान बहुत मुश्किल में रहते हैं । शरीर पर कई परतों वाला कपड़ा होता हैं। चोटी पर पहुंचते-पहुंचते जवान पसीने से तरबतर होते हैं।और स्थिति ये हो जाती हैं कि माइनस में पहुंची ठंड के कारण शरीर पर पसीने भी जम जाते हैं। शून्य से 60 डिग्री तक नीचे तापमान में खाना-पीना भी मुश्किल होता हैं।


जवानों को कैन या टीन के डिब्बा बंद पात्र में पैक्ड खाना दिया जाता हैं। भारतीय सेना के जवान काफी दुर्गम स्थानों पर अपनी जान जोखिम में रखकर सेना पर तैनात रहते हैं।

ये जवान सियाचिन, जहां तापमान माइनस में रहता हैं, वहां मुश्किल वक्त में रहते हैं और देश की सेवा करते हैं। पैट्रोलिंग टीम को तड़के बेस कैंप से निकलना पड़ता हैं ताकि 8-9 बजे तक चोटी पर पहुंचा जा सके। इससे बर्फ पिघल ने के खतरे से बचने में आसानी होती हैं। ऊंचे दुर्गम इलाके में चढ़ाई करते जवानों के साथ कई किलो वजनी बैग होता हैं। 


शून्य से 60 डिग्री तक नीचे तापमान में खाना-पीना भी मुश्किल होता हैंजवानों को कैन या टीन के डिब्बाबंद पात्र में पैक्ड खाना दिया जाता हैं |इसमें ज्यादातर लिक्विड होता हैं जिसे खाने या पीने से पहले आग पर गर्म कर पिघलाना पड़ता हैं। इन मुश्किलों से निपटने के लिए जवानों को सूखे मेवे दिए जाते हैं जिन्हें खाने के लिए पिघलाने की जरूरत नहीं होती।

पीने के पानी की दिक्कत होती हैं और बर्फ को पिघला कर ही पीना होता हैं। यहां तक कि टायलेट के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी को हमेशा स्टोव पर रखा जाता हैं ताकि वह जमे नहीं।


 कड़ाके की ठंड और आक्सीजन की कमी का बड़ा असर नींद पर देखा जाता हैं। जवान ठीक से नींद पूरी नहीं कर पाते जिससे कई समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। इसीलिए सियाचीन के मोर्चे पर डटे जवानों को एक साथ ज्यादा दिन तक नहीं रखा जाता हैं।  

बर्फ के संपर्क में आते ही कोई भी खुला अंग जम जाता है जिसे सही कर पाना काफी मुश्किल होता हैं।


मैं सात बहनों का अकेला भाई हूँ। पिछले तीन साल से में रक्षा बंधन पर घर नहीं जा पाया हूँ। मेरी बहने मुझे रक्षा बंधन पर बहुत मिस करती हैं। सबके भाई रक्षा बंधन पर आते हैं। उनका भाई रक्षा बंधन पर नहीं आ पाता हैं। इस बार मैंने उनको रक्षा बंधन पर घर आने का वादा किया था और मैंने टिकट भी बुक करा लिया था। किन्तु बारामुला में आतंकवाद की घटना हो गयी। पूरे शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। पूरा शहर सेना के कंट्रोल में हो गया और मेरी छुट्टी भी कैंसिल हो गयी।


ऐसी उधेड़ बुन में वोह बारामुला के एक संवेदन स्थान पर मशीन गन ले कर चौकसी कर रहा था । किसी को भी आने जाने की इजाजत नहीं थी। घर से बहार निकलने पर गोली मारने के आदेश थे। 


मैंने अचानक देखा एक मुस्लिम महिला एक हाथ में प्लेट में कुछ लिए हुई हैं। प्लेट के ऊपर एक रूमाल रखा हुआ हैं। दूसरे हाथ में एक सफ़ेद झंडा लिए मेरी और बढ़ रही हैं। मैंने अपनी मशीन गन उसके ऊपर तान दी और उसे फौरन रुकने का आदेश दिया। वो एक दम रुक गयी। मैं उसके पास गया और उससे पूछा ," जानती नहीं हो। पूरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ हैं। देखते ही गोली मारने के आदेश हैं। "

वो मुस्लिम बहिन बड़े अदब से बोली ," भाई जान आज रक्षा बंधन हैं। आप अपने घर से बहुत दूर हो और एक भाई की तरह हमारी रक्षा कर रहे हो। मैं आपको राखी बाँधना चाहती हूँ। उसने प्लेट से एक राखी निकाली। मेरे हाथ में बाँध दी और एक मिटाई का पीस मेरे मुंह में डाल दिया। और मैं सिर्फ रो रहा था। उस बहिन के हाथ चूम रहा था। 

वो बहिन बोल रही थी ,” राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा।”


उस बहिन ने पुनः बोलना शुरू किया ,"मध्यकालीन युग में जब राजपूत और मुस्लिमों के बीच लड़ाई चल रही थी। तब चित्तोड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और प्रजा की सुरक्षा के लिए मदद मांगी। उन्होंने हुमायूं को अपना भाई मानकर राखी भिजवाई | तब हुमायूं ने भी उनकी रक्षा का वचन देकर उन्हें बहन का दर्जा दिया और उनके साथ-साथ उनके प्रजा की भी रक्षा की।”


वो मुस्लिम बहिन इतिहास की अच्छी जानकार थी और बता रही थी ," बंगाल विभाजन का पूरे देश में भयंकर विरोध हुआ। मगर बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसके लिए राखी का इस्तेमाल किया। 16 अक्टूबर 1905 को उन्होंने गंगा में डुबकी लगाकर लोगों से जुलूस का आह्वान किया। इस जुलूस का उद्देश्य था कि हिंदू और मुस्लिम अंग्रेज़ों की फूट-डा-लो राज्य करो की नीति में ना फंसे। एक दूसरे को राखी बांधकर शपथ लें कि वे बंटेंगे नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आगे बढ़कर रक्षा करेंगे।

 

टैगोर कोलकाता की सड़कों पर उस जुलूस के साथ आगे-आगे चलते रहे और जो भी रास्ते में मिला उसे राखी बांधते रहे। उनके साथ राखियों का पूरा गट्ठर था। उस दौर का वो दृश्य भी ऐतिहासिक था जब हर हिंदू हर मुसलमान को राखी बांधते नज़र आ रहा था। बेशक ब्रिटिश अपनी चाल में कामयाब रहे और ये विभाजन रुक नहीं पाया। लेकिन उस दृश्य से ये ज़रूर साबित हुआ कि हिंदू-मुस्लिम असल में ऐसा कोई विभाजन नहीं चाहते थे। “



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