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हरीश कंडवाल "मनखी "

Abstract

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हरीश कंडवाल "मनखी "

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पितृ दोष

पितृ दोष

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  रोशन 12वीं करने के बाद ही अपने मामा के साथ लुधियाना चला गया, वहीं उसने पहले ढाबे में काम किया और उसके बाद धीरे धीरे अपना काम शुरू करते हुए रेस्टोरेंट से लगभग 25 सालों की मेहनत के बाद होटल बना दिया। शुरू शुरू में गॉव आता जाता रहा लेकिन अब वह लुधियाना शहर में रहते हुए बिजनेस मैंन बन गया और तरक्की करते करते वह इतना व्यस्त हो गया कि दोबारा गॉव की ओर नहीं मुड़ पाया। ईधर गॉव में मॉ बाप बूढे हो गये, उनको खुशी थी कि उनका बेटा रोशन लुधियाना में रहकर अपना नाम रोशन करते हुए तरक्की कर रहा है। 

एक दिन रोशन की मॉ अपनी डिंडयाली से सीढी से उतर रही थी और अंधेरे में पैर दूसरी सीढी में रख दिया, जिस कारण उनका संतुलन बिगड़ा और नीचे गिर गयी, वहीं कूल्हे की हड्डी टूट गयी, दो दिन ़ऋषिकेश सरकारी अस्पताल में भर्ती रही और तीसरे दिन अस्पताल में दम तोड़ दिये। मॉ की गिरने की खबर रोशन को मिल गयी थी लेकिन जरूरी काम से दुबई जाने के कारण वह आ नहीं पाया, उसके दोनों बेटे तो पहले ही विदेश में नौकरी कर रहे थे, पत्नी लुधियाना में एक नामी पार्टी में मुख्य कार्यकर्ता थी जिस कारण पार्टी कार्यक्रमों में व्यस्तता के कारण सासू को देखने नहीं आ सकी। ईधर मॉ बेटे का इ्रंतजार करते करते ऑखे पथरा ही नहीं गयी बल्कि हमेशा के लिए ओझल हो गयी। रोशन ने अपने किसी रिश्तेदार के खाते में मॉ के क्रियाक्रम करने के लिए खाते में 25 हजार रूपये ऑन लाईन पेमेंट कर दिये। गॉव में उसका छोटा भाई जो दिव्यांग था उसने अपनी मॉ को मुखाग्नि देकर परलोक के लिए विदा कर दिया। 

तेहरवीं के एक दिन पहले रोशन गॉव आया और मॉ की तेहरवीं करने के बाद पिताजी को साथ चलने के लिए कहा तो उसके पिताजी ने कहा "बेटा साथ नहीं आ सकता हॅू, जब तक जिंदा हॅू तब तक तुम्हारे इस दिव्यांग भाई को देख लूॅ इस बेचारे का कोई नहीं, जब तक हाथ पैर चल रहे हैं, तब तक यहीं रहूॅगा।" रोशन के पिताजी साथ जाने को तैयार नहीं हुए और अगले दिन रोशन अपने परिवार के साथ वापिस लुधियाना आ गया। समय बीतता चला गया और कुछ समय बाद रोशन का दिव्यांग भाई भी अचानक चल बसा लेकिन रोशन उसके क्रिया क्रम के लिए भी नहीं आ पाया। इस बात से खफा होकर रोशन के पिता ने भी अपने बेटे से बात करनी बंद कर दी, और अकेले ही जीवन बिताने लगा। रोशन के पिताजी ने सोचा नहीं था कि रोशन तरक्की के आड़ में सब कुछ भूल जायेगा। कुछ समय बाद रोशन को अपनी पिताजी के देहवसान की खबर मिली और वह अंतेष्टि और तेहरवीं करने के बाद वापिस लुधियाना चला गया। 

 

  कुछ दिन तक तो रोशन के घर में सामान्य चलता रहा लेकिन दो साल बाद जब अप्रत्याशित घटनायें बढती गयी तो रोशन की पत्नी अपने गॅाव में अपने मायके में यह सब बताया तो उसकी भाई की पत्नी चावल लेकर चावल देखने वाले तांत्रिक के पास गयी, उसने चावल देखे और कहा कि जिनके यह चावल हैं उन पर पितृ दोष लगा है, इसकी पूजा करवाये। रोशन पितृ दोष निवारण के लिए पंडित जी के पास गये, पण्डित जी ने कहा कि यह उत्तराखण्ड की पहाड़ की धरती है, इस पितृ दोष का निवारण इसको नचवाकर यानी घड़याली लगा कर ही होगा। 

रोशन ने क्षेत्र के जानकार जागरी/धामी को पितृ दोष यानी हंत्या पूजने के लिए न्यौता देकर घर में बुला दिया। शाम को जागरी रोशन के घर आ गये, रात को खाना पीना हो गया, द्यू पाथा निकाला गया, पाथे पर झंगोरा रख कर उसमें दीया जलाया गया। नीचे की दीवार की तरफ जागरी और उसके साथी बैठ गया, सबको टीका लगाकर जागरी ने बिरदोळी करना शुरू कर दिया, डौंर और थाली बजनी शुरू हो गयी, श्रवण के जागर लगने लगे, डेढ घंटे तक घडियाळी लगी लेकिन कोई नाचा नहीं। जागरीयों ने थोड़ी बीड़ी पी और फिर चाय पीने के बाद फिर दूसरी घडयाली शुरू कर दी, इस बार जागरियों ने पाण्डवों के जागर लगाये। डौंर थाली के थाप से कमरा गूॅज गया, जागर लगाते लगाते पूरे जोश में उकसाने और ललकारना भरने कर नचवाने की पुर जोर कोशिश की गयी लेकिन परिवार के सदस्य कोई हिला तक नहीं। जागरी भी अफसोस करने लगे कि यह कैसी हंत्या है जो इतने जागर लगाने के बाद भी नहीं आ रही है। जागरियों की पूरी कोशिश करने के बाद भी जब कोई नहीं नाचा तो सब आश्चर्य चकित रह गये। रात के डेढ बज चुके थे जागरियों ने एक एक बीड़ी और चाय पी और फिर सो गये, सुबह विदाई लेकर चले गये। 

रोशन ने कहा कि "वैसे तो यह सब मैं मानता नहीं हॅू और न ही मैं विश्वास करता लेकिन परिवार वालों की संतुष्टि हो गयी कि हमने तो जागरी बुलवाकर घड़याली लगवा दी है, अब कोई नाचा नही तो क्या करें, अपना फर्ज पूरा कर दिया है।" उसके बाद वह फिर लुधियाना परिवार सहित आ गया। कुछ दिन तक सामान्य चलता रहा, फिर घर परिवार के साथ विदेश में रहने वाले दोनों बेटों के साथ भी अप्रत्याशित घटनायें घटित होने लगी, रोशन ने तो इसे सामान्य माना लेकिन उनकी पत्नी दूसरी बार स्वयंर चावल लेकर दूसरे बक्की के पास चली गयी। बक्की ने चावल देखते हुए कहा कि तुमने हंत्या के लिए घडयाली लगायी है लेकिन पर्च की पूजा नहीं मिली है, यह रूष्ट हुए पितृ की हंत्या है। बक्की ने चावल उछालते हुए जोर से हुंकार भरते हुए कहा कि इनको अभी तक मुक्ति नहीं मिली है, यह मुक्ति के लिए भटक रहे हैं।  

अब दूसरे जागरी बुलाये गये, यह हर जागर विधा में सि़द्धहस्त थे, उनको दूर के गॉव से बुलाया गया, वह भी शाम को आ गये, रात को खाना खाने के बाद फिर द्यू पाथा पर झंगोरा के ऊपर द्यू रखा गया और उसे प्रज्जवलित किया गया, जागरी ने बिरद्वाली शुरू कर दी, धीरे धीरे जागर लगाने शुरू कर दिया, जागर गायन में श्रवण कथा सुनायी गयी, बड़े ही मार्मिक भाव से जागरी द्वारा जागर गायन शुरू किया गया, कभी डौंर पर जोर की थाप दे रहा था तो साथी जागरी भी भौण पूज रहा था लेकिन फिर कोई अपनी जगह से हिला तक नहीं। जागरी ने कहा कि आज तक के इतिहास मेंं ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसने जागर लगाये हों और कोई नाचा नहीं है। उसने कहा कि चाय पीने के बाद मैं दूसरी घडयाली लगाउंगा और इस बार नहीं नाचा तो मैं आज के बाद यह काम छोड़ दूंगा। अब घड़ियाली जागरी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल और गॉव वालों के लिए कौतूहल का विषय बन चुका था। 

  बीड़ी और चाय पीने के बाद जागरी ने गौकर्ण और धुंघकरी की कथा को जागर गायन के बाद लगा दिया, अब धीरे धीरे जागर और डौंर थाली की आवाज से पूरा घर गुंजायमान हो गया, जागर लगाते लगाते एक घंटा हो गया लेकिन फिर भी कोई अपनी जगह से हिला नहीं लेकिन जागरी अभी भी सारे तरीके अपना रहा था, गर्मियों के दिन थे पडौसियों की गायें बाहर बंधी थीं वह भी कॉपने लगी लेकिन कोई इंसान नहीं कांप रहा था। अब जागरी भी हताश होने लगे लेकिन तब तक वहॉ एक बिल्ली आ गयी, बिल्ली को देखकर जागरी का उत्साह बढ गया, और वह दोगुने उत्साह से फिर जागर लगाने लगा। हर कोई इंतजार कर रहा था, घबराहट और कौतुहल के बीच सबकी नींद गायब थी सबके लिए यह रोचक हो चुका था। 

  जागरी ने गौंकर्ण धुंधकरी के जागर फिर लगाने शुरू कर दिये उसके बाद रोशन की पत्नी कॉपने लगी, अब सब उसकी तरफ देखने लगे, थोड़ी देर में वह रोने रोने लगी काफी देर तक रोने के बाद उसको जब जागरी ने बोलने को कहा तो उसने रोते रोते जो कहा वह सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये।  

  पश्वा ने कि मैं रोशन का पिता हॅू और रोशन से बहुत ज्यादा नाराज हॅूं क्योंकि इसने तरक्की तो कर ली लेकिन अपने मॉ बाप के प्रति अपना फर्ज भूल गया, अपने गॉव गलियारा भूल गया, मुझे अतिंम समय में कोई पानी पिलाने वाला नहीं था, मेरी आत्मा आज भी भटक रही है, आज तक किसी ने मेरे सिरहाने के नीचे रखा पानी के लोटे का ढक्कन नहीं उठाया, रोशन अंदर गया तो वास्तव में पानी का लोटा रोशन के पिताजी के सिरहाने के नीचे रखा था मेरे प्राण उस लोटे में अटके पड़े है, मैंने अपनी मुक्ति पाने के लिए सब छद्म दिखाये, मैं रूष्ट हॅूं अपने बेटे बहुओं से इसलिए सामने प्रकट नहीं होना चाहता था, जब कई प्रलाप और विलाप करने के बाद अपनी मौत की घटना बतायी तो सब दंग रह गये। रोशन की पत्नी कॉपते और रोते हुए कह रही थी कि रात को जब उसने रोशन को फोन मिलाया तो उसने दो बार फोन काट दिया, मैं फोन के इंतजार में वहीं कुर्सी पर बैठ गया तब तब अचानक मेरे सर में दर्द हुआ और मैं बेहोश होकर चारपाई में गिर गया मुझे बहुत प्यास लगी थी लेकिन पानी पानी करते करते मेरा गला सूख गया लेकिन हलक में पानी की बूॅद डालने के लिए कोई नहीं मिला, बस इतने में मेरे प्राण निकल गये और मेरी आत्मा इसी मकान में घूमती रह गयी। 

इसके बाद रोशन ने माफी मॉगी और उसके निवारण करने के लिए बचन ब़द्ध हो गया, उसके बाद नारायण बलि करने के बाद उसे अहसास हुआ कि इतना सब कुछ वह पहले कर देता तो इतना नुकसान नहीं होता और पिताजी माताजी भाई सबको मुक्ति मिल जाती, उसके बाद रोशन हर साल गॉव आकर अपने पितरों का तर्पण और श्रा़द्ध करते हुऐ अन्य लोगों को सीख देता है कि वह उसकी तरह गलती ना करें कि जीते जी मॉ बाप का ध्यान न रखे और मरने के बाद पूरी दुनिया को तेहरवी और श्राद्ध के दिन भोजन खिलाये। 


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