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Bhavna Thaker

Fantasy

3  

Bhavna Thaker

Fantasy

एक सफ़र बना इत्तेफ़ाक़"

एक सफ़र बना इत्तेफ़ाक़"

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बराबर ट्रेन छुटने ही वाली थी की मैं रेलवे स्टेशन में दाख़िल हुई, बोगी भी ढूँढनी थी टिकट भी लेना था तो भागंभागी में पता नहीं किसी से टकरा गई। वो सौरी-सौरी बोलता रहा पर मेरा सिफ़ोन का दुपट्टा उसकी घड़ी में ऐसे उलझ गया कि कितना जोर लगाया निकल ही नहीं रहा था। जैसे जैसे निकालने की कोशिश कर रहे थे फटने लगता था, तो वो बोला आराम से कहीं बैठकर कोशिश करते है निकल जाएगा। मेरी आँखों में आँसू आ गए मेरे पास इतना समय नहीं मेरी ट्रेन छूटने वाली है और मेरा जाना जरूरी है।

और स्लीवलैस ड्रेस था बिना दुपट्टा रह नहीं सकती थी तो उस अजनबी ने मेरी दुविधा समझ ली, मेरे आँसू पोंछते घड़ी उतारकर मेरे हाथ में रखकर बोला अरे आप रोइए मत और जल्दी जाइये इससे पहले की ट्रेन छूट जाएं। मैं किसी भी कीमत पर ट्रेन मिस नहीं कर सकती थी क्यूँकि पापा को दिल का दौरा पड़ा था और मम्मी को मेरी जरूरत थी, तो बिना कुछ सोचे दुपट्टे के साथ बंधी घड़ी लेकर ट्रेन में चढ़ गई, जैसे ही सीट पर बैठी कि ट्रेन चल पड़ी।

साँस हल्की होते ही दिमाग चलने लगा तब खयाल आया अरे ये मैंने क्या कर दिया किसी की इतनी महेंगी घड़ी उठाकर चली आई।

क्या सोचता होगा वो की कैसी लड़की थी घड़ी लेकर चली गई। पर उसका ख़याल आया तो दिल राजधानी की रफ़्तार से धड़क उठा, हाये कितना आकर्षक व्यक्तित्व था उस लड़के का काश कि किसी ओर परिस्थिति में मिला होता।

ना नाम, ना पता, ना मोबाइल नं घड़ी वापस भी कैसे करूंगी। पर अब क्या हो सकता है दिल को टपार दिया, ओये पगले यूँ अजनबी से इतनी प्रीत अच्छी नहीं।

काश कभी उसे मिल पाऊँ तो थेंक्स भी बोल दूँ और घड़ी भी वापस कर दूँ पर

मुंबई जैसे शहर में दोबारा उसका मिलना संभव भी तो नहीं। उसके हसीन खयालों में ही सफ़र कट गया ये सोचते हुए कि फ़िल्मों की तरह काश असली ज़िंदगी में भी इत्तेफ़ाक़ होते, कहीं बिछड़े हुए को वक्त फिर से मिला दें पर ये ज़िंदगी है उम्मीद ही नहीं।

मैं अहमदाबाद पहुँच गई पापा को मिली, तो जान में जान आई डॉक्टर से भी मिली अब पापा खतरे से बाहर थे ओर कुछ ठीक भी थे, मम्मी के चेहरे पर भी कुछ सुकून आ गया।

मैं मुंबई में नौकरी कर रही हूँ माँ पापा की इकलौती संतान हूँ, पापा का मन नहीं था पर MBA पूरा करने के बाद मुंबई की एक बढ़िया कंपनी से ऑफ़र मिली तो मैंने ज़िद करके पापा को मना लिया ओर चली गई। 

स्टेशन पर हुआ वाकया मैंने माँ पापा को सुनाया तो दोनों हँस पड़े और पापा मजाक में बोले कहीं घड़ी वाले को मेरी बेटी पसंद तो नहीं आ गई की इतनी महंगी घड़ी लूटाकर चला गया। मैं मन ही मन बोली पापा उसका तो पता नहीं पर आपकी बेटी को वो जरूर पसंद आ गया था, एक आह निकल गई बस। अब सब ठीक था छुट्टियाँ भी खत्म होने को आई,

पर इस बार मैं टाल नहीं सकी मम्मी- पापा बहुत ज़ोर देने लगे, बेटी अब तो शादी के लिए हाँ बोल दे तुझे अच्छा घर ओर वर मिल जाए तो हम दोनों की चिंता कम हो जाए, तो मैंने बोल दिया ठिक है आप लोग अभियान शुरु कीजिए कोई ढंग का लड़का पसंद आएगा तो चली जाऊँगी आपको छोड़कर ससुराल और क्या। और पापा के ठीक होते ही मैं वापस मुंबई आ गई। 

लगभग ६ महीने बाद माँ का फोन आया की कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर आ जा तीन चार लड़कों से तेरी शादी की बात चला रखी है, मिल लो ओर फिर पसंद आए तो बात आगे बढ़ाएँगे।

उम्र भी तो हो रही थी ओर माँ-पापा की चिंता भी हल्की करनी थी तो सोचा चलो मिल तो लूँ क्या पता अब शादी वाले ग्रहों को जल्दी हो सो कोई चक्कर चल जाए।

और कुछ दिन की छुट्टी लेकर घर जाने निकल पड़ी दिल में एक आस लिए की काश रेलवे स्टेशन पर फिर वही लड़का इत्तेफ़ाक़ से मिल जाए तो इस बार सामने से प्रपोज़ करके हमसफ़र बना लूँ पर खुद के खयाली पुलाव को दफ़न कर दिया ये कहकर कि पगली ये ज़िंदगी है फ़िल्म नहीं इतनी बड़ी दुनिया में दोबारा उससे मुलाकात की उम्मीद करना मूर्खता है। उदास मन से सफ़र खत्म करके आ गई घर। रोज एक लड़के से मुलाकात होती रही, ठीक ठाक थे एक दो दिल को भा भी रहे थे। बस आज आखिरी लड़के से मिलना था पर ये बंदा कुछ हटके था, उसने कहलवाया की वो किसी के घर में नहीं बल्कि किसी रेस्टोरेंट में मिलना चाहता है वो भी सब घर वालों के सामने नहीं वो और मैं अकेले में। हमने कहा ठीक है चलो इस अजीब इंसान से भी मिल लेते है।

उसने टेबल बुक करवाकर रेस्टोरेंट का नाम पता ओर टेबल नं. भेज दिया। शाम ६ बजे एकदम टिपटाॅप तैयार होकर मैं भी पहुँच गई। वेटर से पूछा टेबल नं, टेबल पर एक लड़का बैठा हुआ था पीठ पीछे से तो अंदाज लग रहा था की हाँ दिखने में अच्छा और आकर्षक होगा, चलो देखते है। मैं धीरे से टेबल की ओर बढ़ी ओर हाय मैं इशिता बोलते उसके सामने खड़ी हो गई, वो नज़र नीची किये मोबाइल में गेम खेल रहा था मेरी आवाज़ सुनकर चौंककर खड़ा हो गया ओह हैलो मैं विहान, हम दोनों एक दूसरे को देखते ही ६ महीने पीछे रेलवे स्टेशन पे पहुँच गए। दोनों के मुंह से एक जैसे ही शब्द निकल पड़े ओह माय गॉड आप ? 

आज मुझे उपर वाले पर यकीन हो चला अगर पूरी शिद्दत से कुछ पाने की चाह रखो तो उसे मिलाने पूरी कायनात लग जाती है। होते हे ज़िंदगी में इत्तेफ़ाक भी।

हम दोनों को ही क्या बोले क्या नहीं कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो उसने बड़ी अदब से कुर्सी खिंचकर बड़े आदर के साथ मुझे बैठने को बोला। में बैठ गई, बंदी तो ६ महीने पहले ही फ़िदा हो चली थी आज तो मन में लड्डू क्या सारी मिठाइयां फूट रही थी। फिर तो सेन्डविच ओर कोफ़ी पीते दोनों घंटा भर बातें करते रहे एक दूसरे को जाना, पहचाना वो बार-बार मेरी आँखों में खो जाता था हम दोनों ही इस इत्तेफाक से खुश थे।

बहुत देर हो गई तो माँ का फोन आया तो विहान ने ही मेरे हाथ से मोबाइल ले के माँ को बोला मम्मी जी चिंता मत कीजिए अब से ये तूफ़ान आपकी नहीं मेरी ज़िम्मेदारी है।

मैं कायल हो गई मेरे विहान की, उसने मेरे गाल पर थपकी लगाते पूछा क्यूँ ये बंदा चलेगा ना आपका हमसफ़र बनने के लायक है की नहीं..!

मैं शरमाकर इतना ही बोली जब मेरे दुपट्टे से आपकी घड़ी ने बंधन बाँध ही लिया है तो ये रब जी की ही मर्जी होंगी बाकी मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था की इस जन्म में आपसे कभी दोबारा भी मुलाकात होगी।

और अलग-अलग दिशाओं से आए हुए दो अनदेखे अनजाने हमसफ़र बनने की राह पर साथ साथ एक नये सफ़र की ओर हाथ थामें चल निकले रेस्टोरेंट से निकलकर अपनी मंजिल की ओर ज़िंदगी के सफ़र पर....उस सफ़र पर कुर्बान जिस सफ़र ने मुझे मेरे हमसफ़र से जो मिलवाया। तो ज़िंदगी में कभी मायूस मत होना होते है इत्तेफ़ाक भी कभी-कभी॥



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