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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

जलते शहर दंगों के बीच

जलते शहर दंगों के बीच

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यह कहानी एक ऐसे डॉक्टर की है जिसमें हमेशा लोगों की हर परिस्थिति में सेवा करी है भले वह प्लेग हो, कोई भी तरह की बीमारी हो अभी कोरोना था पहले दंगे हो शहर में

आपके शीषर्क रियल हीरो के अंतर्गत मैं यह कहानी प्रस्तुत करना चाहूंगी

जब भी कोई भी शहर में दंगे होते हैं राजनीतिक पार्टियां अपना हाथ सेकती हैं।

और सीधी-सादी सामान्य जनता और उनके जान माल की और लोगों की बहुत हानि होती है बहुत ज्यादा मारकाट और बसे जला देना घर जला देना कार्य जला देना जगह-जगह पर होली करना यह सब होता रहता है हमने बड़ौदा में तीन चार बार सांप्रदायिक दंगे देखे और उन दंगों के बीच में लोगों को फंसते हुए जान समय लोगों का भाईचारा और सेवा भावना भी देखी गोधरा कांड के समय तो हाल चाल इतने खराब थे उस समय की एक रचना

बड़ा अच्छा शीर्षक दिया है सीमाएं बुलाए तुझे चल रही सीमाएं पुकारे सिपाही। मुझे ऐसा लगता है कि हर इंसान में एक सिपाही छुपा होता है। जो देश सेवा के लिए तत्पर और समर्पित होता है ।जिस तरह सिपाही को बुलाती हैं उसी तरह से देश में जब आतंकवादी हमले होते हैं दंगे होते हैं ,तब सिपाहियों, मिलिट्री उनके साथ-साथ आम जनता का ध्यान रखने के लिए डॉक्टर्स को भी सिपाही रूप में आ जाना पड़ता है ।मैं जो आपके साथ में शेयर कर रही हूं ।कहानी रूप में शेयर कर रही हूं यह एकदम सच्चा है ।और मेरे पति के साथ ही हुआ है।

जब गोधरा कांड हुआ था ,और बड़ौदा में बहुत ही दंगे फैल गए थे लोग हिंदू मुस्लिम दंगों में काफी स्टैबिंग वगैरह चल रही थी। तब की बात है उस दिन को मैं जिंदगी में कभी भूल नहीं सकती इधर दंगे चालू हुए ।

उधर गवर्नमेंट का आर्डर मेरे पति को मिला कि आप जमुना बाई हॉस्पिटल जो कि बिल्कुल दंगे के इलाके में ही है जिसके दरवाजे पर ही दंगे हो रहे थे ।

क्योंकि वह संवेदनशील एरिया है, इमरजेंसी में आप वहां पहुंचो ,और दंगे पीड़ित लोगों को अटेंड करो ।आप सोच सकते हैं हम लोगों की क्या हालत हुई ऐसा लगे कि लोग तो दंगों से भागकर के घर के अंदर छुप गए हैं और डॉक्टर को वहां जाना पड़ रहा है।

एंबुलेंस सामने खड़ी हो गई ,यह मेरे को बोल कर के गए कि आप बिल्कुल चिंता ना करो मुझे जाना है। मैं भी एक सिपाही हूं देश की रक्षा लोगों की रक्षा के लिए मुझे जाना ही पड़ेगा और चल दिए। उस जमाने में तो मोबाइल फोन वगैरा भी नहीं थे ,और दूसरे लैंडलाइन के ठिकाने नहीं थे। पूरा शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था ।हम लोगों की तो सांस अटक रही थी क्या होगा। राम-राम करके पूरा दिन निकाला, दूसरा दिन निकाला। दूसरे दिन शाम को जाकर के डॉक्टर साहब घर आए और उन्होंने जो स्थिति बताई ,कि कैसे उन्होंने दरवाजे पर ही छोटे-छोटे युवाओं की हत्या होते देखी ।और कितने लोगों की स्थल ट्रीटमेंट कर फिर उसके बाद दूसरे दिन थोड़ी शांति हुई तब घर आए । तब हमारी जान में जान आई ऐसा तो बहुत बार हुआ है ।सीमाएं देश की हो या शहरों के शांति रखने के लिए मिलिट्री और ऑफिसर्स को अपना काम करते ही रहना पड़ता है। बिल्कुल एक सिपाही की तरह डटे रहना पड़ता है ।धन्यवाद।


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