सरकारी दवा खाने में पैथोलॉजी लेब नौकरी का पहला दिन
सरकारी दवा खाने में पैथोलॉजी लेब नौकरी का पहला दिन
जिंदगी में नौकरी करना तो सबको अच्छा लगता है कंपनियों में और ऑफिस में नौकरी करने का अलग हिसाब होता है।
मगर जब वही नौकरी पब्लिक प्लेस में डायरेक्ट जनता के साथ करनीहै तो उसकी बात कुछ अलग हो जाती है।
अपनी नौकरी का पहला दिन कॉरपोरेट ऑफिस के पहले दिन से बहुत हद तक अलग होता है क्योंकि वह तो एकदम फाइव स्टार जितने अच्छे ऑफिस होते हैं और वहां पर काम करना ,
जबकि मेरा एक्सपीरियंस तो सरकारी हॉस्पिटल में नौकरी करना अपनी ट्रेनिंग लेनाथा वह एक अलग ही लेवल पर जाता है जो आपको बहुतकुछ सिखा देता है जिंदगी केउतार-चढ़ाव के लिए आपको तैयार कर देता है
तरह-तरह के लोग और पब्लिक की सेवा बहुत ही अच्छा एक्सपीरियंस रहा। पर पहला दिन… सुनने में जितना सरल लगता है, उतना होता नहीं।
वह भी बड़े-बड़े धुरंधरों के बीच में सब अपने-अपने फील्ड के बहुत एक्सपर्ट।
एक बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल की लैब में कदम रखते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं एक बिल्कुल नई दुनिया में आ गई हूँ।
चारों तरफ मशीनों की आवाज़, मरीजों की भीड़, रि
पोर्ट्स का ढेर और समय से दौड़ती घड़ी बीच-बीच में डॉक्टर का आकर कहना इसकी रिपोर्ट दो उसकी रिपोर्ट दो सबके सैंपल अलग रखना
… सब कुछ मेरे लिए नया था। क्योंकि यह मेरे जोब और ट्रेनिंग दोनों का हिस्सा था। टेक्नीशियन दिख रहे थे वह तो
बहुत ही अच्छे दिख रहे थे मददगार लग रहे थे। मन को तसल्ली देते हुए की सब अच्छे लग रहे हैं। कोई खडूस नहीं है।
मैंने खुद को संभालते हुए काम शुरू किया।
उस दिन मेरी ड्यूटी सुबह आउटडोर में ब्लड सैंपल कलेक्ट करने की थी।
पहला ही सैंपल लेते समय मेरे हाथ हल्के कांप रहे थे। लग रहा था कहीं मैं ब्लड ले भी पाऊंगी या नहीं मगर एक भी डबल पंचर नहीं करना पड़ा।
सामने बैठे मरीज की निगाहें मुझ पर थीं और मेरे भीतर डर और जिम्मेदारी का अजीब सा संघर्ष चल रहा था।
मैंने खुद को समझाया — “तुमने यह सीखा है, तुम कर सकती हो।"
काम चल ही रहा था कि अचानक मुझे ऑफिस से बुलावा आया।
दिल की धड़कन तेज हो गई — “क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”
घबराते हुए मैं अंदर गई, तो देखा कि मेरी दोनों मैडम और बाजपेई सर वहाँ बैठे थे। माहौल सख्त था, लेकिन उनके चेहरे पर एक सहजता भी थी।
उन्होंने मुझे बैठाया।
सामने चाय और समोसा रखा था।
मेरे लिए वह पल आश्चर्य और राहत दोनों था।
उन्होंने मुझसे बात की, मेरा परिचय लिया और बहुत शांत स्वर में कहा —
“यहाँ काम बहुत जिम्मेदारी वाला है। गलती की गुंजाइश नहीं है, लेकिन सीखने का पूरा मौका मिलेगा। बस एक बात याद रखिए — काम समय पर और सही होना चाहिए।” और रिपोर्टिंग बिल्कुल सही होनी चाहिए क्योंकि मरीज के जिंदगी का सवाल होता है।
उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।
लैब का काम शुरू हुआ।
उस दिन लगभग 100 ब्लड व100 यूरिन सैंपल्स की जांच करनी थी। काम शुरू करने में ही घबराहट हो रही थी मगर करना तो था ही चालू कर दिया।
मेरे दोनों मैडम और बाजपेई सर स्वभाव से बहुत सहयोगी थे, लेकिन काम के मामले में उतने ही सख्त।
रोज़ का काम दोपहर 1 बजे तक हर हाल में पूरा करना होता था।
ऐसा उन्होंने मुझे बताया था, बीच में सिर्फ आधे घंटे का समय मिलता था, जिसमें हम जल्दी-जल्दी नाश्ता करते और फिर वापस काम में लग जाते।
घड़ी की सुइयाँ जैसे मुझसे आगे दौड़ रही थीं।
पहला दिन… नया माहौल… और इतना सारा काम…
दबाव बढ़ता जा रहा था।
इसी जल्दबाज़ी और तनाव के बीच मुझसे एक-दो रिपोर्टिंग में गलती हो गई।
एक पल के लिए मेरा मन घबरा गया।
मैंने सोचा — “क्या करूँ? क्या चुप रह जाऊँ? शायद किसी को पता न चले…”
लेकिन अगले ही पल एक विचार आया —
“यह सिर्फ कागज की रिपोर्ट नहीं है, यह किसी की सेहत का सवाल है।”
उस क्षण मैंने एक निर्णय लिया
सच बताने का निर्णय।
मैंने हिम्मत करके अपनी मैडम को अपनी गलती बताई।
मुझे लगा था कि शायद मुझे डांट पड़ेगी, लेकिन उन्होंने मुझे डांटा नहीं। वैसे भी वे मेरा सारा काम वापस ऑब्जर्व कर रही थी। पहला दिन था इसलिए काम पूरा मेरे ऊपर नहीं डाला था उनको भी संतोष करना था ना
उन्होंने बहुत शांति से मेरी गलती समझाई और कहा —
“गलती होना गलत नहीं है, उसे छुपाना गलत है।
अगर तुम सीखने के लिए तैयार हो, तो हम सिखाने के लिए हमेशा तैयार हैं।”
उनकी यह बात मेरे दिल में उतर गई।
उस दिन मैंने सिर्फ काम नहीं सीखा…
मैंने सीखा — जिम्मेदारी क्या होती है, समय का मूल्य क्या होता है और सबसे बढ़कर — ईमानदारी क्या होती है।
और सबसे बड़ी बात हर टेस्ट का सही रिजल्ट देना ना ज्यादा ना कम एकदम बराबर क्योंकि मरीज के जिंदगी का सवाल होता है।
शाम को जब मैं दिनभर की थकान के बाद बैठी थी, तो वही मैडम मेरे पास आईं और मुस्कुराकर बोलीं —
“पहला दिन आसान नहीं होता… लेकिन तुमने आज खुद को संभाल लिया। यही सबसे बड़ी बात है।”
उस दिन का समोसा और चाय आज भी मुझे याद है —
क्योंकि उसमें सिर्फ स्वाद नहीं था, उसमें अपनापन और एक नई शुरुआत की मिठास थी।
समय के साथ मैंने बहुत कुछ सीखा, आगे बढ़ी…
और एक दिन ऐसा भी आया जब मैंने अपनी खुद की पैथोलॉजी लैब शुरू की। साथ में कार्डियोग्राम मशीन भी राखी और इंटीरियर गांव में साढे तीन साल तक बहुत सेवा दी।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ आता है —
मेरे करियर की नींव उसी पहले दिन पड़ी थी।
वही सख्ती, वही अनुशासन, वही ईमानदारी…
आज भी मेरे काम का हिस्सा हैं।
उस दिन की छोटी-सी गलती ने मुझे जो सिखाया,
वही मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गई। मेरे लिए एक बहुत बड़ा सबक थी मैंने मेरी जिंदगी के अंदर काम की बाउंड्री सेट करी जब तक पूरी तरह कंफर्म नहीं
जब तक रिपोर्टिंग नहीं करना।
पहला दिन सिर्फ एक शुरुआत नहीं था…
वह मेरी पहचान बनने की पहली सीढ़ी था।
— स्वरचित सत्य
