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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

एक अनचाही बेटी का मां को संवेदना भरा खत

एक अनचाही बेटी का मां को संवेदना भरा खत

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प्रस्तावना
कुछ बातें ऐसी होती हैं जो होंठों तक आकर भी शब्द नहीं बन पातीं। वे दिल के किसी कोने में सालों तक दबी रहती हैं। और जब बाहर आती हैं, तो सिर्फ बातें नहीं, पूरा दर्द बह जाता है।"
एक लड़की अपनी मां को खत लिख रही है। वह परिवार की तीसरी लड़की है उसके साथ में उसके भाई का जन्म भी हुआ है और परिवार वाले तीसरी लड़की नहीं चाहते थे तो उसको बहुत अनदेखा करते हैं और जिंदगी में उसको कुछ मानना ही नहीं कहीं से भी उसको प्रेम मां-बाप का प्रेम भाई बहन का प्रेम रिश्तेदारों का प्रेम कुछ नहीं मिला हर जगह से तिरस्कार ही मिला और उसको नगण्य हीं माना गया‌ वह लड़की आज बहुत अच्छी जॉब में है और अपनी जॉब पर जाते हुए सामान पैक करके सबसे विदा लेती है और साथ में अपनी मां-बाप के लिए चिट्ठी भी छोड़ जाती है।

पूज्य मां,
आज मैं आपकी अनचाही तीसरी बेटी अपने दिल की वे बातें लिख रही हूं, जो हमेशा अनकही रह गईं। और अब आपसे बहुत दूर जा रही हूं।
आपने अपनी जिंदगी में शायद मेरी कभी चाहत रखी ही नहीं थी। मैं तो आपकी अनचाही बेटी थी। दो बेटियों के बाद आपने अपने बेटे की आशा रखी थी, मगर भगवान को तो आपको तीन बेटियां और एक बेटा देना था। इसलिए उसने आपके बेटे के साथ जुड़वां तीसरी बेटी भी दे दी, जिसे आपने तिरस्कारपूर्वक अपनाया और जिंदगी भर तिरस्कार ही दिया।
जब भी मुझे मां की जरूरत होती, मां हमेशा भाई के पास होती। पापा तो मुझे देखना भी पसंद नहीं करते थे, जैसे ईश्वर ने मुझे आपके परिवार में भेजकर कोई गुनाह कर दिया हो, और वह गुनाह मेरा हो।
मेरा क्या गुनाह था मां? अगर भगवान ने मुझे आपके पास भेजा, तो आपका यह फर्ज था कि बेटे के साथ मुझे भी प्यार से पालतीं। मगर नहीं, आपने ऐसा नहीं किया। हर जगह मेरे मुंह का निवाला छीनकर भी उसे दिया और मुझे एक फालतू समझकर कोने में छोड़ दिया।
आपको देखकर सब रिश्तेदार भी ऐसा ही करने लगे। यहां तक कि दादी तो मुझे कभी पसंद ही नहीं करती थीं। यह सब देखकर मैं बिल्कुल अकेली पड़ गई थी। तब मैंने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया और खूब मेहनत की।
जब मुझे अपनी पढ़ाई की दिशा चुननी थी, तब भी आपने पैसों का रोना रोया। भाई को मेडिकल में भेज दिया और मुझे बीए करने पर मजबूर कर दिया। उसके लिए भी मुझे खुद पैसे कमाने पड़े।
कोई बात नहीं, मैं हार नहीं मानी। मेहनत करके मैंने अच्छी पढ़ाई की और आज बहुत अच्छी नौकरी पाई है।
आपने तो छुट्टियों में भी मुझे अपने पास नहीं रखा। छुट्टियां होतीं, तो कभी मामा के पास, कभी मासी के पास, कभी बहन के पास भेज देतीं। और सबको जैसे बिना पैसे की नौकरानी मिल गई हो, वैसा व्यवहार करते। मैं कुछ कहती भी तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि मैं आपकी अनचाही तीसरी बेटी थी।
घर में भी मैंने आपका प्यार पाने के लिए बहुत काम किए, आपके साथ रहने की बहुत कोशिश की, मगर आपने कभी प्रशंसा के दो शब्द तो दूर, कभी हंसकर मुझे गले भी नहीं लगाया।
कोई बात नहीं मां, गया समय तो वापस नहीं आ सकता। मगर अब मैंने अपनी मेहनत से एक अच्छी नौकरी पा ली है। और अब मैंने दूसरे शहर में ट्रांसफर ले लिया है। अब वहीं रहूंगी।
आपके पास कभी नहीं आऊंगी। आपकी अनचाही तीसरी बेटी।
आप कभी आवाज लगाएंगी तब भी मैं आपके पास नहीं आऊंगी, क्योंकि आपके पास दो बेटियां और एक बेटा और हैं, जिन्हें आपने बहुत प्यार दिया है। आप उन्हीं के साथ प्यार से रहिए।
भूल जाइए कि आपकी कभी एक तीसरी अनचाही बेटी भी थी, जो मां-बाप और पूरे परिवार के होते हुए भी एक अनाथ की तरह पली है।
"मां, मैंने हमेशा आपकी एक मुस्कान और एक बार गले लगाने की चाह रखी थी, मगर शायद वह भी मेरी किस्मत में नहीं था।"
ये बातें जो मैं आपको कभी कह नहीं पाई, आज लिखकर बता रही हूं।
हां, अब आप मेरी चिंता बिल्कुल मत करना। वैसे तो आपने कभी की नहीं, मगर अब तो बिल्कुल मत करना।
"अब मैं अपने हिस्से का प्यार कहीं और ढूंढने जा रही हूं।"
"हां मां, इतना जरूर कहूंगी कि आपने मुझे चाहे जितना तिरस्कार दिया हो, मगर मैं अपने संस्कार नहीं भूलूंगी। अगर कभी जरूरत पड़ी, तो मैं अपने फर्ज से कभी पीछे नहीं हटूंगी। क्योंकि बेटी होने का फर्ज मैं निभाऊंगी, चाहे मां-बाप होने का फर्ज आपने मेरे लिए कभी निभाया हो या नहीं।"
आपकी अनचाही तीसरी बेटी
स्वरचित कहानी



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