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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

4.5  

Vimla Jain

Tragedy Action Classics

बेबस आंखें

बेबस आंखें

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बेबस आंखें
अशोक राय अपने ड्राइंग रूम में बैठे थे सोफे पर बहुत विचार मग्न सामने बेबस आंखों की एक फोटो लगी हुई थी वे उसकी तरफ देखकर विचार मगन हो गहरी सोच में डूबे हुए थे।
वे सोच रहे थे मेरे पास में इतनी धन संपत्ति है मैं करोड़ों पति कहलाता हूं। मगर फिर भी मेरा मन हमेशा बेचैन रहता है मैं हमेशा अपने अशक्त बच्चे की तरफ देखता हूं तो लगता है भगवान ने मेरी सजा इसे क्यों दी पाप मैंने किया और इसको जिंदगी भर इसी तरह बिना कुछ हंसते बोलते एक जिंदा लाश की तरह पड़े हुए देखना इसके जन्म के साथ इसकी मां का चले जाना।
यह सजा मुझे मिली है मगर मेरे साथ मेरे बेटे को भी मिली और उनका मन बहुत ही पश्चाताप से भर जाता है। वे सोचते हैं आज तो मुझे खुश होना चाहिए कि मेरी बेटी विदेश से आ रही है पढ़ करके मगर मुझे वापस उसके सवाल ही बेचैन कर रहे हैं।
वह हमेशा इस आंखों वाली पेंटिंग को देखकर के यही बात पूछती थी कि यह बेबस आंखें क्यों है?
और आपकी आंखें भी इतनी बेबस क्यों दिखती हैं?
आंखों में कोई चमक नहीं दिखती आखिर ऐसा क्या कारण है?
इतने साल तो उन्होंने उसको किसी तरह से टाल दिया
उसको बोला तू पढ़ कर आना फिर बताऊंगा अब तो
पढ़ाई भी पूरी करके आ गई उसने फोन पर भी मेरे से यही जिद करी है और यही गिफ्ट मांगी है।
अब मैं क्या करूं मेरा मन  पश्चाताप से बहुत भर रहा है सोचते सोचते उनकी आंखों में पानी आ जाता है और वह उस समय में चले जाते हैं।
तभी उनकी बेटी आ जाती है।
वह विचार मगन पिता को देखते हुए पूछती है क्या हुआ पिताजी आज भी आप इतने उदास बैठे हैं आज तो मैं खुश हूं ।
मैं आई हूं पढ़ाई पूरी करके  आई हूं और मैं इसलिए खुश हूं कि आज आप कोई राज बताने वाले हैं
इस पेंटिंग से जुड़ा हुआ।
मैंने कितनी बार इसको हटाने की कोशिश करी पर आपने हमेशा मना करा।
आज तो आपको मेरे को यह राज बताना ही पड़ेगा मैं तो चाय नाश्ता भी बाद में ही करूंगी।
अशोक राय जो बहुत ऊंची भी  हस्ती माने जाते थे अपनी बेटी के सामने कमजोर पड़ जाते हैं और वह अपनीआप  बीती सुनाते हैं।
वे बताते हैं पहले हमारे पास बिल्कुल पैसा नहीं था बहुत खींच तान के घर चलता था।
मुझे हमेशा लगता था कि मेरे को कहीं ना कहीं से पैसा
कमाऊं।
जबकि तेरी मां बोलती थी हम जो है उसमें खुश हैं कम से कम  सब साथ तो है।
मगर मेरा मन नहीं मानता था। वह कोई भी तरह से पैसा लेना चाहता था ।
इस समय हमारी कॉलोनी में से एक बस जा रही थी उत्तराखंड की यात्रा पर।
मांजी भी चार धाम की यात्रा करने की इच्छा रखते थे ।
मगर पैसे नहीं होने के कारण वे चुप थे मैंने आने वाले बच्चे के लिए
आठ, ₹10000 बचत कर रखे थे, तो मैंने सोचा मैं मांजी को भेज देता हूं उनकी यह इच्छा पूरी हो जाएगी।
वे बहुत खुश हुई और वे जब उत्तराखंड की यात्रा के लिए गए उत्तराखंड में भेखड़ चट्टान का टुकड़ा धंस गया और सड़क पर आने वाले जाने वाले राहगीर पर गिर गया उसमें यहां से उत्तराखंड गई थी वह बस भी थी उसपर भी गिर गया।
बहुत अफरातफरी   मच गई।
मैं भी भाग कर वहां पहुंचा वहां मैंने देखा सरकार की तरफ से मृत्यको के 20 लाख रुपए दिए जा रहे थे और जो घायल है उनको 20000 और इलाज ।
मेरा कपटी मन मां की मौत की कामना कर बैठा और मेरे मन ने मेरा साथ दिया ।
हाथ पांव कटी हुई जिंदा मां की बेबस आंखों में उनको ले जाने की गुहार दिख रही थी।
मगर मैंने सरकारी लोगों से झूठ बोल दिया और मां को मरा हुआ घोषित कर दिया ।
और वहां से 20 लाख रुपए लेकर आ गया।
गांव छोड़कर शहर आ गया यहां अपना बिजनेस चालू करा ।
सब अच्छा चलने लगा मगर बार-बार में मां की  बेबस आंखें सामने आ जाती थी  तो मैंने वह चित्र बनवाया ।
विधि का विधान देखो ।
थोड़े समय बाद मेरे यहां पुत्र जन्म की तेरे भाई के जन्म की प्राप्ति हुई, मगर वह एक मांस के लोचे  जैसा था।
और उसके जन्म के साथ तेरी मां चल बसी अब मैं इस बच्चे को देखकर के और तेरे को देखकर जिंदगी जी रहा हूं।
जिंदगी में बहुत पश्चाताप कर रहा हूं।
हर क्षण मुझे मां की आंखें नजर आती है।
मगर मैं तो भी जाकर के मां को नहीं देखा मैं इतना शैतान बन गया मेरे को बहुत पश्चाताप हो रहा है। मन में बिल्कुल खुशी नहीं है सरकार की सहायता को मैंने गलत ढंग से लिया और गलत ढंग से उपयोग किया ।
अब बेटी तू मेरे को जो सजा देना चाहे वह दे सकती है मैं उफ भी नहीं करूंगा। वह बोलती है पापा आप मेरी नजरों से गिर गए हैं ।
यह रुपया पैसा किस काम का मुझे कुछ नहीं चाहिए।
मैं यहां पर वृद्धा आश्रम और चाइल्ड केयर सेंटर बनाना चाहती हूं जिसमें मेरे भाई जैसे बच्चे रहेंगे और मुझे आपके पैसे में से एक भी पैसा नहीं चाहिए ,और नाराज होकर वहां से चली जाती है। अशोक राय सच में आज तो टूट ही जाते हैं और उतने पश्चाताप में दुखी हो जाते हैं और बेटी से माफी मांगते रहते हैं ।
बेबस आंखें बार-बार उनको यह याद दिला रही है कि बेटा एक बार तो आकर देखा होता  मेरे को।
मगर क्या हो सकता है तो समय बीत गया और जो गलती करी जिसकी कोई भरपाई नहीं है ।
ईश्वर के डंडे में आवाज होती नहीं होती है मगर ईश्वर सबका हिसाब करते हैं।
बेटी ने जो केयर सेंटर खोला उसका नाम बेबस आंखें रखा और उसने अपने पिताजी को संभाला तो सही ,मगर जिंदगी भर उनसे बात नहीं करने का प्रण लिया। पिता भी क्या कर सकते क्या बोल सकते थे ।
माता-पिता का प्रेम जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
उन्हें अनदेखा करना आसान है, पर उनका दर्द समझना ही सच्ची मानवता है।
क्योंकि उन्होंने करनी ही ऐसी करी थी यह था अशोक राय का पश्चाताप मगर कहते हैं ना 900 चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। ऐसा ही उनके साथ भी हो गया।
माँ तो चली गईं,
पर उनकी बेबस आँखें अशोक राय के अंतर्मन में हमेशा जीवित रहीं।

स्वरचित कहानी



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