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विजय बागची

Abstract

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विजय बागची

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बारिश

बारिश

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आज तन-मन का कुछ भीगना है बाकी,

मंद हवाओं में जब बारिश है आ जाती,

वो संग अपने सुकूँ का पल है ले आती,

आज तन-मन का कुछ भीगना है बाकी।


तब न पूछो इस मन का हाल,

जैसे लहरों संग नौका है बह जाती,

जैसे किरणों संग लालिमा है रास आती,

मैं भी तब ऐसा ही कुछ, महसूस करता हूँ,

बारिशों में फिर से रमने की, आस लिए रहता हूँ,

अब न पूछो हाल दिल का, यह हो गया है जज़्बाती,

आज तन-मन का कुछ भीगना है बाकी।


अब भी उन बौछारों की आस लिए बैठा हूँ,

उनमें डूब जाने का एहसास लिए बैठा हूँ,

वो रास्ते में कहीं सो तो नहीं गयी,

अपने मन में इतना बड़ा काश लिए बैठा हूँ,

कह दो उन्हें अब आ भी जाये,

यूँ साँसे है थम जाती,

इस गर्म मौसम में जब,

बादल और छाँव है पास आती,

आज तन-मन का कुछ भीगना है बाकी।


अब सब्र का बांध टूट रहा है,

जैसे कोई आने से पहले ही रूठ रहा है,

इंतजार के कितने लम्हें बीत गये,

पर यह कुछ पल का इंतज़ार, साथ नहीं निभाती,

आज तन-मन का कुछ भीगना है बाकी। 


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