भूख को तिलमिलाते देखा है
भूख को तिलमिलाते देखा है
भूख की रौशनी में कभी, यहाँ उजाला नहीं होता
उसकी तक़दीर में कभी, यहाँ निवाला नहीं होता
किसीने लिखी कहानियाँ, किसीने उसके किस्से
जनाब वह गरीब है, कुछ नहीं आता उसके हिस्से
रात के अँधेरे में जब, सितारों को टिमटिमाते देखा है
दिन के उजाले में कल, भूख को तिलमिलाते देखा है
बादल ख़ूब बरसे हैं मगर, गला उसका सूखा है
घर में चूल्हा नहीं जला, आज फिर सोया भूखा है
सड़क का किनारा ही, सालों से उसका बसेरा है
महलों में जगमग रोशनी, उसके घर में अँधेरा है
पौष की ठंडी रातों में, उसको कंपकंपाते देखा है
जिंदगी के हर मोड़ पर, भूख को तिलमिलाते देखा है
अब तक तुमने क्या किया, संसद से इक सवाल है
जब कुछ नहीं किया, फिर बेवजह मचा क्यों बवाल है
हाथ की लकीरें कहती हैं, नहीं ऐसी इसकी तक़दीर है
सरकारी दफ्तरों में आज, धूल फांकती इसकी तस्वीर है
मुफलिसी के बोझ तले, अक्सर इसे बिलबिलाते देखा है
गाँव-गाँव शहर शहर, सबने भूख को तिलमिलाते देखा है
आसमान की ऊंचाईयों पर, ये भी उड़ना चाहता है
देश की आर्थिक नीतियों से, आज ये जुड़ना चाहता है
गगन चुम्बी मीनारों की, इसने ही डाली बुनियाद है
इसके दिन कब बदलेंगे, शासन से इसकी फ़रियाद है
भूखों की बस्ती के सामने, महलों को जगमगाते देखा है
महलों की दहलीज़ पर, भूख को तिलमिलाते देखा है
मजबूत अर्थतंत्र अगर चाहिए, तत्काल कुछ करना होगा
इसके घर भी चूल्हा जले, लड़ना या फिर मरना होगा
इसका जो भी हक़ है, हर हाल में इसको दिलाना होगा
इसके घर के अंधेरों को, आज उजालों से मिलाना होगा
अमीरों की क़िस्मत को, लाचारों को चमचमाते देखा है
मगर अमीरों के आँगन में, भूख को तिलमिलाते देखा है
