बचपन :- युवा भारत की
बचपन :- युवा भारत की
धूल से सना, पसीने में लथपथ,
मैले पुराने कपड़े
फिर भी स्कूल का भारी बस्ता
पीठ पर लादे, अपनी ही
उहापोह लिए
भरपेट खाने की आस में
नंगे पाँव पाठशाला
जाते देखा एक बचपन।
कुछ तो भर पेट खाने और
परिवार का पेट भरने के लिए
आलीशान होटलों से थोड़ी दूर पर
छोटे से ढाबे के तो क़भी घरों में
जूठे बर्तन उठाते
देखा एक बचपन ।
हद तो तब आती है बचपन की जब
तपती धूप हो या कड़कड़ाती ठंड
गोद में खुद से और छोटे बचे को
लिए हर सिग्नल में
हर आने जाने वाले के आगे
हाथ फैलाकर गुज़ारा करते भी देखा एक बचपन।
क़भी नसें में धुत तो क़भी लोगों के
जेब कतरते तो क़भी कचरें के डब्बे में
भोजन ढूँढते भी देखा एक बचपन।
दिल सिहर सा उठा जब देखा
युवा भारत का ये कड़वा बचपन।
थोड़ी सी सासों में साँस तब आयी
जब स्कूल बस में और कारों में
हँसते मुस्कुराते स्कूल जाते
तो क़भी मैदानों में दौड़ लगाते
धमा चौकड़ी करते
तो क़भी माँ बाबा के सामने ज़िद में रोते भी
देखा एक बचपन।
ये भी एक बचपन और वो भी एक बचपन।
