नन्ही बूंद
नन्ही बूंद
नभ में छाए बादल थे
गरज उठी थी दसों दिशाएं,
चंचल चपला के आने से
महक उठी थी सभी फिजाएं।
तत्क्षण मैं भी प्रकट हुई
पूरी कर लूं हर इच्छाएं,
बनकर किसी सीप का मोती
सफल करूं मैं हर आशाएं।
नभ से गिरी वृक्ष पत्तों पर
आज वहीं पर ठहर गई ,
यह कैसा अस्तित्व है मेरा
ओस बूंद बन सिहर गई।
फिर मैं गिरी पुष्प दलों पर
संग उसी के महक उठी,
तभी हवा का झोंका आया
बंद कली भी चटक उठी।
पुष्प दलों से गिरी बूंद जब
सोचा अब मैं मिट जाऊंगी,
सागर की लहरों में अब मैं
अन्य बूंद सी मिल जाऊंगी।
मेरा अब अस्तित्व न होगा
अब न रहेगी कोई पहचान,
देव दुआ यदि मिले आज तो
पाऊं तेरी शरण निधान।
तभी खुला मुख एक सीप का
मेरी आंखें चमक उठी,
सपना अब साकार हुआ
बनकर मोती दमक उठी।
अपनी सीमा जान सकी मैं
अपना यह अस्तित्व अपार,
हे हरि ! आज तुम्हारे चरणों में
यह मोती का नन्हा उपहार।
