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ज़िन्दगी प्यार का गीत है

ज़िन्दगी प्यार का गीत है

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"पापा..." आधी रात में नितिका अचानक चीखकर उठ बैठी।

उसे आशंका हो रही थी कि उसके पापा के साथ कोई अनहोनी हुई है।

खुद को संभालते हुए किसी तरह उठकर उसने कमरे में रखी लालटेन जलाई और उस पल को कोसने लगी जब वो अपने पापा के समझाने के बावजूद ज़िद करके उनसे इतनी दूर आ गयी। तब उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि ये कुछ दिनों की दूरियाँ हमेशा के लिए होने वाली हैं।

किसी तरह खुद को समझाकर उसने सामने ही मेज़ पर रखी धूल की मोटी परत चढ़ चुकी तस्वीर को उठाया और उसे देखते हुए और बिलखकर रो पड़ी। उसके आँसुओं से तस्वीर पर जमी धूल की परतें हटती जा रही थी और धीरे-धीरे उसमें कैद दोनों चेहरे नज़र आने लगे थे, नितिका और उसके पापा नितेश के चेहरे।

नितेश को तस्वीरें खिंचवाना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन नितिका की ज़िद पर उसके इक्कीसवें जन्मदिन पर उन्होंने ये तस्वीर खिंचवाई थी। तब से ये तस्वीर नितिका के जीवन का हिस्सा बन गयी थी। वो जहाँ भी जाती, ये तस्वीर उसके साथ होती।

लेकिन किसे पता था कि उस इक्कीसवें जन्मदिन के बाद वक्त ऐसी करवट लेगा कि एक-दूसरे के बिना एक पल भी ना रह पाने वाले पिता और पुत्री के बीच इतनी लंबी खाई खिंच जाएगी कि दोनों इसे पाट नहीं पाएंगे।

जैसे-जैसे नितिका के आँसू थमते जा रहे थे, उसका मन पिछले दिनों घटी घटनाओं में फिर से डूबता जा रहा था।

उसे याद आ रही थी अपने इक्कीसवें जन्मदिन की वो शाम जब उसके पापा ने उसकी मृत माँ की वसीयत उसे सौंपी थी जिसके अनुसार अब वो कानूनी रूप से अपनी माँ की संपत्ति की वारिस थी।

नितिका की माँ 'सुधा' अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। वो लोग एक छोटे से गांव में रहते थे जहाँ सुधा के पिताजी विद्यालय के हेडमास्टर थे। उनके पास एक पक्का मकान और अच्छी-खासी खेतीबाड़ी भी थी।

नितिका के जन्म के कुछ महीनों के बाद ही सुधा की मृत्यु हो गयी थी। इसलिए उससे जुड़ी कोई याद नितिका के ज़ेहन में नहीं थी। उसने अपनी माँ को बस तस्वीरों में ही देखा था। सुधा की मृत्यु के बाद नितेश नितिका को लेकर अपने गांव और नाते-रिश्तेदारों से बहुत दूर आकर दिल्ली में बस गए थे जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता था।

नितिका आज तक अपने किसी रिश्तेदार से कभी नहीं मिली थी। वसीयत मिलने के बाद उसने ज़िद पकड़ ली कि वो अपनी माँ के गांव जाएगी और उस घर और उन खेतों को देखेगी जो अब उसके हो चुके हैं।

नितिका के मुँह से निकलते ही उसकी हर फरमाइश पूरी करने वाले उसके पापा ने पहली बार उसकी इस ज़िद को पूरा करने से मना कर दिया। नितिका को इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। अपनी बात मनवाने के लिए वो भूख हड़ताल पर बैठ गयी।

नितेश के लाख समझाने पर भी वो टस से मस नहीं हुई। आखिरकार हारकर उन्होंने उसे गांव जाने की अनुमति दे ही दी लेकिन खुद उसके साथ जाने से मना कर दिया।

नितिका के साथ उसकी सहेली प्रीति भी जा रही थी। उन्होंने कभी गांव नहीं देखा था इसलिए दोनों सहेलियां बहुत उत्साहित थी।

प्रीति के साथ जाने के कारण नितेश भी थोड़े आश्वस्त थे, फिर भी ट्रेन में नितिका को बिठाते हुए नितेश का मन अनजानी आशंका से घिरा जा रहा था। उन्हें ऐसा लग रहा था मानों उनकी बेटी हमेशा के लिए उनसे दूर जा रही है।

जैसे-जैसे ट्रेन आगे बढ़ रही थी नितेश का मन पीछे छूट चुके अतीत की यात्रा पर जा रहा था।

उसे याद आ रहा था वो दिन जब गांव के मुखिया जी के घर में चारों तरफ रौनक ही रौनक थी। घरवालों के साथ-साथ सारे गांव वालों के चेहरे भी खुशी से खिले हुए थे। मुखिया जी थे ही ऐसे, सबके सुख-दुख के भागीदार, दिल खोलकर ज़रूरतमंदों की मदद करने वाले।

उनका बेटा नितेश भी पिता के ही पदचिन्हों पर चल रहा था और इसलिए सारे गांव का लाड़ला था। आज उसी लाड़ले नितेश की बारात सज रही थी।

सारे गांववाले अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार शादी के काम में हाथ बंटा रहे थे।

तय वक्त पर सभी रीति-रिवाज़ों को निभाते हुए नितेश की बारात पड़ोस के गांव के लिए निकली। उसकी होने वाली दुल्हन थी सुधा, अपने गांव के हेडमास्टर की इकलौती बेटी, रूप और गुण दोनों में अव्वल।

मुखिया जी बहुत प्रसन्न थे कि उनके बेटे को सर्वगुणसम्पन्न पत्नी मिली थी।

बहू को लेकर घर पहुँचते ही उसके स्वागत के पश्चात मुखिया जी ने अपने गांव समेत आस-पास के सभी गांवों के गरीब लोगों के लिए भंडारे का आयोजन करवाया, जिसमें उनके परिवार के साथ तमाम गांववालों का सहयोग उन्हें खुशी-खुशी प्राप्त हुआ।

सब लोग नए जोड़े को ढ़ेर सारी दुआएं दे रहे थे और उनके खुशहाल जीवन के लिए कामना कर रहे थे।

उधर दुल्हन बनी सुधा अपने-आप में सिमटी हुई स्वयं को उन दुआओं के बोझ तले दबता हुआ महसूस कर रही थी। उसके आँसू थम ही नहीं रहे थे। सब लोग यही सोच रहे थे कि मायके से विदाई के बाद निकलने वाले ये स्वाभाविक आँसू है, लेकिन सुधा के दिल में तो भावनाओं का ऐसा बवंडर उठ रहा था, जिसे काबू ना करने पर वो उसके मायके और ससुराल दोनों परिवारों की खुशियों को हमेशा-हमेशा के लिए रौंद सकता था।

जैसे-तैसे वो खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी। घूंघट में हिचकियाँ लेती हुई सुधा को देखकर उसकी सास देवकी जी पानी का ग्लास लेकर उसके पास आयी और स्नेह भरा हाथ उसके सर पर रखते हुए बोली,

"बेटी, मैं तुम्हारे आँसुओं की वजह समझ सकती हूँ। हम सभी स्त्रियों को एक ना एक दिन इस दर्द से गुज़रना पड़ता है, जब अचानक ही मायके के आंगन से हमारी जड़ों को उखाड़कर एक नितांत अजनबी आंगन में हमेशा के लिए रोप दिया जाता है। लेकिन तुम घबराना मत, यहाँ तुम्हारी ये माँ हर पल तुम्हारा ख्याल रखने के लिए मौजूद है।"

उनकी बातें सुनकर सुधा उनकी गोद में सिर रखकर और ज़ोर से रो पड़ी। थोड़ी देर बाद जब स्वतः उसका मन शांत हुआ तब आगे की रस्में शुरू की गयी।

रस्मों के खत्म होने के बाद आराम करने के लिए सुधा अपने कमरे में आ गयी।

उधर अपनी दुल्हन की तारीफ सुन-सुनकर उसकी एक झलक देखने के लिए नितेश का मन बेचैन हो रहा था। लेकिन इस वक्त इंतज़ार करने के अलावा उसके वश में कुछ नहीं था।

आखिरकार वो घड़ी भी आ ही गयी जब गांव और रिश्ते की सभी भाभियाँ हँसी-ठिठोली करती, उसे छेड़ती हुई उसके कमरे तक उसे छोड़ने पहुँची, जहाँ उसकी नई-नवेली दुल्हन उसका इंतज़ार कर रही थी।

नितेश जब कमरे में पहुँचा और उसकी नज़र घूंघट में सिमटी हुई सुधा पर पड़ी तो उसे यूँ महसूस हुआ मानों उसका धड़कता हुआ दिल उछलकर उसके हाथ में आ जाएगा।

उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो सुधा के पास जाकर क्या कहें, कैसे बातचीत की शुरुआत करे। इसलिए वो चुपचाप जाकर सुधा के पास ही बिस्तर पर बैठ गया।

जब उसे महसूस हुआ कि सुधा आहिस्ते-आहिस्ते रो रही है तब उसने उसका घूंघट उठा दिया और उसकी आँसुओं से भरी सूजी हुई आँखों को देखकर एकबारगी घबरा गया।

नितेश ने आहिस्ते से सुधा का हाथ थामते हुए कहा "आप बिल्कुल घबराइए मत। जब तक आप मेरे साथ सहज नहीं हो जाती मैं आपके करीब नहीं आऊंगा। अब आप आराम कीजिये। शादी की रस्मों में बहुत थक गयी होंगी।"

नितेश की बात सुनकर सुधा ने सोचा "ये और इनका परिवार कितना भला है। मुझे अपने दिल की बात इनसे कह देनी चाहिए।"

लेकिन अगले ही पल उसकी अंतरात्मा ने उसे झिंझोरा "आखिर तू इनसे कहेगी क्या ? और कहने के बाद अगर ये सारे भले लोग बदल गए तब क्या करेगी तू इसलिए अभी चुप रह और खुद को वक्त के हाथों सौंप दे।"

इन्हीं विचारों में डूबती-उतराती सुधा ना जाने कब नींद के आगोश में समा गयी उसे पता भी नहीं चला।

धीरे-धीरे शादी में आये हुए मेहमान विदा लेकर चले गए। अब घर में बस नितेश, उसके माता-पिता और सुधा रह गए थे।

सब लोग अपनी दैनिक दिनचर्या पर लौटने लगे थे। सुधा भी देवकी जी के साथ मन लगाकर ससुराल के तौर-तरीके सिख रही थी।

उसकी और नितेश की शादी को एक महीना पूरा होने जा रहा था लेकिन उन दोनों के बीच की दूरियां अब भी नहीं मिटी थी। हालांकि अब दोनों एक-दूसरे के साथ काफी सहज हो चुके थे।

आज सुधा ने सोच लिया था कि शाम को जब नितेश आएंगे तो उनसे अपने मन की सारी व्यथा बाँटकर वो आगे के लिए कुछ मदद कर देने को कहेगी। लेकिन शायद वक्त ने कुछ और ही तय कर रखा था।

शाम को जब नितेश खेतों से लौटा तो देखा देवकी जी मिठाइयों के ढ़ेर सारे डिब्बे तैयार करवा रही है और मुखिया जी खुशी-खुशी सभी नौकरों को बख्शीस बांट रहे है। उसे ये माजरा कुछ समझ में आता कि तभी देवकी जी ने एक लड्डू लाकर उसके मुँह में डाल दिया और उसकी बलैयां लेते हुए बोली "जुग-जुग जियो मेरे लाल।"

"आखिर बात क्या है माँ ? किस बात पर मिठाईयां और बख्शीस बांटे जा रहे है और मेरी बलायें ली जा रही है ? और आप अकेली क्यों काम कर रही है ? सुधा कहाँ है? "

"बहू अपने कमरे में आराम कर रही है।" नितेश के पास आते हुए मुखिया जी बोले।

"आराम ? क्यों ? क्या हो गया उसे ?" नितेश हैरान-परेशान सा बोला।

देवकी जी ने कहा "अब वो हर वक्त आराम ही करेगी। हमारा वारिस जो देने जा रही है हमें। हमारा पोता या पोती।"

ये सुनकर नितेश की हालत यूँ हो गयी कि काटो तो खून नहीं। उसे यूँ सदमे में देखकर उसके माता-पिता घबरा गए।

मुखिया जी बोले "देख बेटा, अगर तू आजकल के चलन की तरह जल्दी बच्चे नहीं चाहता था तो ये तुझे पहले सोचना चाहिए था। अब तू कुछ भी उल्टा-सीधा करने का ख्याल अपने मन में मत लाना। तू खुशी-खुशी बहू के साथ वक्त बिताना। अपने पोते या पोती को हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।"

देवकी जी ने भी उनकी बात से सहमति जताई। उनकी खुशी देखकर नितेश कुछ ना कह सका। वो चुपचाप अपने कमरे में चला गया जहाँ सुधा बेचैन सी चहलकदमी कर रही थी। नितेश को सामने देखकर उसने अपनी नज़रें झुका ली और उसके सवालों का इंतज़ार करने लगी।

लेकिन जब काफी देर तक नितेश ने कुछ नहीं कहा तब सुधा किसी तरह हिम्मत जुटाकर बोली "क्या आपको मुझसे कुछ नहीं पूछना ?"

"क्या पूछूं मैं तुमसे कि तुमने मुझे धोखा क्यों दिया ? मेरे भोले-भाले माँ-बाप के अरमानों के साथ क्यों खेला ? अब जवाब जानकर भी मैं क्या करूंगा ? ये जवाब मेरे माँ-बाप को जीते-जी मार डालेंगे। मैं अपने-आप को रोज़ मरता हुआ बर्दाश्त कर सकता हूँ लेकिन उन्हें घुट-घुटकर सिर झुका कर जीते हुए नहीं देख सकता।"

नितेश की बातें सुनकर सुधा का अंर्तमन चीत्कार कर उठा और उसे धिक्कारने लगा कि आखिरकार क्यों शादी के पहले वो नितेश और उसके परिवार को सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं जुटा सकी, क्यों उसने अपने माता-पिता की इज्जत की दुहाई का वास्ता मानकर इन लोगों के साथ छल किया और सबसे ज्यादा तकलीफ उसे इस बात की हो रही थी कि क्यों प्रेम में अंधी होकर वो उस इंसान को अपना सब कुछ सौंप बैठी जो उसकी हालत का भान होते ही बजाए सबके सामने उसका हाथ थामने के चुपचाप बीच मंझधार में उसे अकेला छोड़कर रातोंरात ना जाने कहाँ गायब हो गया था।

लेकिन अब सिवा पछताने के उसके हाथ में कुछ नहीं था।

दिन गुजरते जा रहे थे। देवकी जी ने उसका ख्याल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। इधर नितेश ने खुद को काम में इस कदर डूबा लिया था कि उसे ना दिन का होश रहता था ना रात का।

गांव के उसके हमउम्र लोग और भाभियाँ उसे छेड़ते हुए कहती "लगता है नितेश बाबू अपने बच्चे के लिए अभी से महल खड़ा कर देना चाहते है, तभी दिन-रात पसीना बहा रहे है।"

नितेश उनकी बातों का उत्तर बस एक फीकी मुस्कान से देकर आगे बढ़ जाता।

उधर उसके माता-पिता जहाँ एक तरफ दादा-दादी बनने की खुशी में डूबे थे, दूसरी ओर अपने बेटे की हालत देखकर चिंतित भी थे। देवकी जी ने कई बार सुधा का मन टटोलने की कोशिश की, कि कहीं उसके और नितेश के बीच कोई समस्या तो नहीं है, लेकिन सुधा कभी कुछ नहीं कहती। आखिर उसके पास कहने के लिए था ही क्या ?

आखिरकार सबने यही अनुमान लगाया कि शायद अचानक इतनी जल्दी मिली इस खुशखबरी के कारण नितेश की ये हालत है।

मुखिया जी बोले,

"चिंता मत कर नितेश की अम्मा, ये आजकल के लड़के अलग ही मिट्टी के होते जा रहे हैं। उसका मन था बहु के साथ शिमला जाने का, शायद इसलिये दुखी रहता है। बाप बनने जा रहा है लेकिन अभी भी बचपना नहीं गया उसका। बच्चे का मुँह देखेगा तो खुद ठीक हो जाएगा।"

देवकी जी हाँ में सिर हिलाते हुए बेटे की खुशी के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगी।

उधर नितेश दिन-प्रतिदिन मन ही मन घुटता जा रहा था। उसके जीवन में ऐसा कोई नहीं था जिससे वो अपना दर्द बांट सकता।

सुधा से उसकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी लेकिन अब उसके वश में था ही क्या ?

आखिरकार वो दिन भी आ गया जब घर में किलकारियां गूंजने वाली थी। दर्द से कराहती हुई सुधा को प्रसव कराने वाली दाई और देवकी जी ढांढस बंधा रही थी।

कुछ देर के बाद एक प्यारी सी बिटिया के आगमन के साथ ही सुधा क्लांत हो गयी।

पोती को गोद में लिए देवकी जी कमरे से निकली। खुशी के मारे उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

"जल्दी बता, नितेश की अम्मा, कौन आया है ?" मुखिया जी व्यग्रता से बोले।

बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं को काबू करती हुई वो बोली "साक्षात लक्ष्मी आयी है जी। देखिए कितनी प्यारी है।"

अपनी पोती को गोद में लेकर मुखिया जी ने घर के सभी नौकरों को बुलाकर पूरे गांव में मिठाई बंटवाने के आदेश दिए और एक नौकर को खेत पर भेजा नितेश को बुलाने के लिए।

नितेश के आने पर जब मुखिया जी ने बच्ची को उसकी गोद में देना चाहा तो लाख कोशिश करने पर भी आज नितेश अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख सका और बच्ची को बिना देखे ही मुँह फेरकर चला गया।

उसका ये व्यवहार देखकर उसके माता-पिता चौंक गए। उन्हें अपने समझदार और नेकदिल बेटे से ये उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।

"पढ़ा-लिखा होकर भी क्या तुम्हारा लल्ला बौरा गया है नितेश की अम्मा जो बेटी के जन्म की खबर सुनकर यूँ मुँह फेरकर चला गया ?" मुखिया जी अपने क्रोध को काबू करने की कोशिश करते हुए बोले।

अंदर कमरे में सुधा के कानों तक भी ये आवाज़ पहुँची। वो फूट-फूटकर रो पड़ी।

उसके रोने की आवाज़ सुनते ही तुरंत देवकी जी उसके पास पहुँची और बोली,

"बेटी इस हालत में तेरा ऐसे रोना ठीक नहीं है। तू चिंता मत कर। मैं बात करूंगी नितेश से। वो दिल का बुरा नहीं है। पता नहीं उसे क्या हो गया है अचानक ? लगता है किसी बुरी बला का साया पड़ गया है उसके ऊपर। मैं कल ही पंडित जी को भी बुलाती हूँ।"

दर्द से कराहती सुधा ने किसी तरह खुद को शांत किया और भविष्य की अनजानी आशंकाओं से घिरी हुई सोने की कोशिश करने लगी।

गांव वालों की नज़र में परिवार का मान बना रहे इसलिए मुखिया जी ने बच्ची के जन्मोपरांत होने वाले छठी संस्कार के आयोजन में सभी को न्योता भेजा। उनकी हिदायत के बावजूद नितेश जब छठी संस्कार में नहीं पहुँचा तब सभी लोगों में तरह-तरह की बातें होने लगी जो मुखिया जी और देवकी जी से छुपी नहीं थी। लेकिन चेहरे पर झूठी मुस्कान सजाये, जरूरी काम से नितेश के बाहर जाने की बात सबको बताते हुए वो सभी अतिथियों के आवभगत में लगे हुए थे।

तीन दिनों के बाद नितेश घर लौटा और बिना किसी से कुछ कहे-सुने अपने कमरे से अपना सारा सामान निकालकर दूसरे कमरे में चला गया। दिनों-दिन घर के माहौल में तनाव बढ़ता ही जा रहा था जिसे खत्म करने की पहल कोई नहीं कर पा रहा था।

देवकी जी ने पंडित जी को बुलाकर ग्रह-शान्ति की पूजा भी करवाई लेकिन कोई असर नहीं हुआ।

कभी जिस घर में बारहों महीने खुशियां चहकती थी अब वहां एक सन्नाटा सा पसरा रहता था जिसे कभी-कभार बस नन्ही बच्ची के रुदन की आवाज़ ही भंग करती थी।

सुधा अपनी बच्ची को सीने से लगाये अपने अपराधों के बारे में सोचते हुए दिन-रात सिसकती रहती थी।

देखते-देखते पांच महीने गुजर चुके थे। पंडित जी ने बच्ची के नामकरण और अन्नप्राशन संस्कार की पूजा की तिथि निकाल दी थी।

देवकी जी ने जब इस विषय पर नितेश से बात करनी चाही तो उसने कहा "अम्मा, आप सबको जो उचित लगे कीजिये, लेकिन मुझे इस सब में मत घसीटिए।"

"आखिर क्यों ना घसीटें ? बाप है तू हमारी गुड़िया का। आज तुझे बताना ही पड़ेगा कि बात क्या है ? बहुत हो गया रोज़-रोज़ का तमाशा। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारा बेटा एक दिन अपनी ही बेटी का इस तरह तिरस्कार करेगा।" पहली बार मुखिया जी चीखे।

गुस्से में नितेश भी आज खुद पर काबू नहीं रख सका। अपने आँसुओं को जब्त करने की नाकाम कोशिश करते हुए उसने कहा,

"वो मेरी बेटी नहीं है बाबूजी। मैंने बहुत कोशिश की आप दोनों की खुशी के लिए उसे सहजता से अपनाने की लेकिन मुझसे नहीं होता बाबूजी। जब भी मैं उसके पास जाने की सोचता हूँ आपकी बहू का दिया हुआ धोखा मेरे कदम पीछे खींच देता है। मैंने तो कभी किसी को धोखा नहीं दिया, किसी का दिल नहीं दुखाया, फिर मेरे साथ धोखा क्यों हुआ...।"

अपने बेटे को इस तरह बिलख-बिलखकर रोते हुए देखकर मुखिया जी और देवकी जी के हाथ-पैर फूल गए। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका बेटा अपने अंदर इतना दर्द समेटे जी रहा होगा। कोने में सर झुकाए खड़ी सुधा पर नज़र पड़ते ही उनकी अनुभवी नज़रें समझ गयी कि उनका बेटा सच बोल रहा था।

देवकी जी ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा "कभी नहीं सोचा था कि इतनी सीधी-सरल दिखने वाली लड़की और इसका परिवार अंदर से इतना चालाक होगा।"

सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया।

मुखिया जी ने तुरंत अपने विश्वासपात्र नौकर राजू को सुधा के माता-पिता को बुलाने भेजा।

कुछ घंटों के बाद जब वो लोग पहुँचे तब हेडमास्टर साहब और उनकी पत्नी के नमस्कार का जवाब दिए बिना मुखिया जी ने सीधे उनसे पूछ,

"क्या आप जानते थे की आपकी बेटी शादी से पहले ही गर्भवती थी ?"

हेडमास्टर साहब की खामोशी ने मुखिया जी के सवाल का जवाब दे दिया था।

मुखिया जी फिर बोले,

"आपने क्या सोचकर मेरे निर्दोष बेटे की ज़िंदगी खराब की ? मैं मानता हूँ कभी-कभी जवानी के जोश में बच्चों से गलती हो जाती है, लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि हम उनकी गलती छुपाने के लिए किसी दूसरे की ज़िंदगी बर्बाद कर दें। देखिये मेरे बेटे की तरफ क्या हालत हो गयी है आज उसकी।"

अंततः हेडमास्टर साहब अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बोले,

"भाईसाहब मैं मजबूर था। अपनी इज्जत बचाने का यही एक रास्ता दिख रहा था मुझे।"

"काश आपने और सुधा ने बात छुपाने की जगह एक बार हमें अपना मानकर सच बताया होता तो शायद उसे और उसके बच्चे को अपनाने में मुझे इतनी तकलीफ नहीं होती।" नितेश ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा।

"लेकिन बेटा, हमें लगा कि कोई भी लड़का ये बात जानकर उससे शादी नहीं करेगा और हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।" सुधा की माँ बेबस स्वर में बोली।

उनकी बात सुनकर देवकी जी बोली,

"और आपको ये कैसे लग गया कि लड़के वालों को अंधेरे में रखकर शादी कर देने के बाद किसी को कुछ पता नहीं चलेगा और आपकी बेटी सुखी रहेगी ? हमारा बेटा तो फिर भी आज तक चुपचाप ये दर्द सहता रहा, लेकिन आये दिन समाज में बहुओं के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में क्या आप नहीं जानते जब जरा-जरा सी बात पर ससुराल वाले बहू को घर से निकाल देते है या उसकी हत्या करने से भी नहीं हिचकते है।"

"हम जानते थे आप बहुत भले लोग है, कम से कम हमारी बेटी के साथ आप ऐसा नहीं करेंगे।" हेडमास्टर साहब ने जवाब दिया।

ये सुनकर मुखिया जी ने कहा,

"वाह, क्या खूब फायदा उठाया आपने हमारी अच्छाई का। हमारी भलमनसाहत ही आज हमारे बेटे के जीवन पर ग्रहण बनकर छा गयी।"

ये सब बातें चल ही रही थी कि तभी सुधा के कमरे से किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आयी। सब लोग कमरे की तरफ दौड़े। वहाँ पहुँचकर जो उन्होंने देखा उसे देखकर देवकी जी अचेत हो गयी।

सुधा फांसी के फंदे पर झूल रही थी और नीचे गिरे हुए टेबल के पास उसकी नन्ही सी बच्ची बिलख रही थी।

मुखिया जी ने तुरंत बच्ची को उठा लिया और नौकरों को आवाज़ दी। सबने मिलकर सुधा के शरीर को नीचे उतारा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सुधा इस दुनिया से जा चुकी थी।

सब लोग अचानक हुए इस हादसे से सदमे में थे।

थोड़ी देर के बाद अचेत देवकी जी की तरफ ध्यान जाते ही मुखिया जी ने तुरंत वैद्य जी को बुलाने के लिए राजू को दौड़ाया।

वैद्य जी ने आकर देवकी जी की नाड़ी जांची, लेकिन अफसोस वो चिर-निद्रा में समा चुकी थी।

एक के बाद एक घर के दो सदस्यों की मृत्यु ने जैसे मुखिया जी और नितेश पर गाज ही गिरा दी। दोनों मृत शरीरों के पास बैठे हुए वो कुछ सोचने-समझने की स्थिति में नहीं थे।

तभी मुखिया जी ने देखा बच्ची लगातार अपनी माँ का आँचल पकड़े रोये जा रही थी। उसकी नन्ही हथेली से सुधा का आँचल छुड़ाने के क्रम में मुखिया जी की नज़र आँचल में बंधे हुए एक कागज के टुकड़े पर गयी।

उन्होंने उसे निकालकर देखा तो वो सुधा की लिखी हुई चिट्ठी थी।

"आदरणीय अम्मा, बाबूजी

मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये। नितेश जी ने सही कहा मुझे उन्हें अंधेरे में रखने की जगह पहले ही सच बता देना चाहिए था तब शायद इस घर में और उनके जीवन में वो विपदाएं ना आती जो मेरी वजह से आयी।

आपने सदैव मुझे अपनी बेटी से बढ़कर माना। आपकी बेटी मरते वक्त झूठ नहीं बोलेगी।

हाँ मैं मानती हूँ मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई, जिसे मैंने अपना सच्चा प्रेम समझा उसने मुझे सिर्फ एक शरीर समझा।

जब मुझे मेरी स्थिति का पता चला तब मैंने अपने माता-पिता से कहा कि वो मुझे किसी नारी-निकेतन में भेज दें, मैं पढ़ी-लिखी थी थोड़ी मदद मिल जाती तो अपने बच्चे को पाल लेती, लेकिन उन्होंने स्वयं के आत्मदाह के साथ-साथ मेरे बच्चे को मेरे अंदर ही मार डालने की धमकी देते हुए कहा कि जहाँ भी जाना हो शादी के बाद जाना।

मैं उसकी ज़िन्दगी खतरे में कैसे डाल सकती थी जिसका कोई दोष ही नहीं था, जिसने अभी तक ये दुनिया देखी भी नहीं थी। जब आप लोगों के यहां जबर्दस्ती मेरा रिश्ता पक्का हो गया तब मैंने सोच लिया कि हिम्मत करके नितेश जी को पहले ही दिन सब बताकर उनसे आग्रह करूंगी की मुझे नारी-निकेतन भेज दें और किसी दूसरी भली लड़की से शादी कर लें, मैं खुद दूसरे लड़की वालों के आगे अपनी सच्चाई स्वीकार करने की ठान चुकी थी ताकि नितेश जी या आप लोगों पर कोई ऊँगली ना उठे। लेकिन उस दिन कुछ कहने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई और इससे पहले की मैं उनके साथ सहज होकर उनसे अपनी समस्याएं, अपनी उलझनें बांट पाती आप लोगों को मेरी स्तिथि के बारे में सब पता चल गया।

अब जबकि मैं आप सबके दुख और कलंक की वजह बन चुकी हूँ तो मेरा इस दुनिया से जाना ही ठीक है। अब मैं आप लोगों की आँखों में और आँसू नहीं देख सकती। बस अंतिम विनती है आपसे की मेरी बच्ची मेरे माता-पिता को मत सौंपियेगा। उसे किसी अनाथ-आश्रम में रखवा दीजिएगा। मेरे नाम पर जो पैतृक संपत्ति है उसके कागज पर दस्तखत करके मैंने अलमारी में रख दिये है। कोई व्यवस्था कर दीजिएगा की जब मेरी बेटी बालिग हो जाये तो उसे उसका हक मिल जाये ताकि उसे दर-दर की ठोकरें ना खानी पड़े।

आपकी अभागी बहू

सुधा"

इस चिट्ठी का एक-एक शब्द मुखिया जी और नितेश की आँखों से आँसू बनकर गिर रहा था।

मुखिया जी ने उसी वक्त नौकरों को बुलाकर हेडमास्टर साहब और उनकी पत्नी को घर से निकलवा दिया।

हेडमास्टर साहब ने धमकी भरे स्वर में कहा,

"मैं सारे समाज को बताऊंगा की आपकी प्रताड़ना के कारण मेरी बेटी चल बसी।"

"आपकी इन धमकियों से डरने वाला अब कोई नहीं रहा। हमारी बहु हमारी सुरक्षा का इंतजाम करके गयी है इस चिट्ठी के द्वारा। बेहतर है अब आप चुपचाप यहाँ से चले जाएं।" मुखिया जी ने तल्ख स्वर में जवाब दिया।

कुछ घंटे बीतते-बीतते गांववालों को मुखिया जी के घर में घटी घटना और उसकी वजह का पता चला। सब अपने आदरणीय, स्नेही मुखिया जी और नितेश के आँसू पोंछने दौड़ पड़े। सबने मिलकर देवकी जी और सुधा के अंतिम संस्कार का बंदोबस्त किया।

सुधा की अर्थी उठाते हुए मुखिया जी नितेश से बोले,

"बेटे, मैं जानता हूँ कि मैं तेरे दुख का अंदाजा भी नहीं लगा सकता जिसकी दुनिया बसने से पहले ही इस तरह उजड़ गयी। लेकिन मेरे बच्चे इस नन्ही सी जान की तरफ एक बार देख, इसे किस बात की सज़ा मिल रही है ? इसे अपना ले चाहे सड़क पर फेंकी हुई अनाथ समझ कर ही, लेकिन इसे यूँ ना ठुकरा। इसे माता-पिता दोनों का प्यार देकर मेरी और अपनी माँ की परवरिश की लाज रख ले।"

उनकी बात सुनकर पहली बार नितेश ने सुधा की बच्ची को देखा जो बेतहाशा रो रही थी। जैसे ही नितेश ने उसे गोद में लिया वो चुप होकर उसके सीने से यूँ लग गयी जैसे अब खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हो।

इस अहसास ने, इस लम्हे ने नितेश और उसे एक अटूट बंधन में बांध दिया।

देवकी जी और सुधा की तेरहवीं के बाद नितेश ने मुखिया जी से कहा,

"बाबूजी, अब यहाँ मन नहीं लगता। दिल्ली में मेरे कुछ दोस्त है। मैंने उनसे बात की है। मुझे नौकरी मिल जाने की पूरी उम्मीद है। अगर आपको आपत्ति ना हो तो क्या हम दिल्ली जाकर रह सकते है ?"

"मैं भी यही सोच रहा था बेटे की यहाँ से दूर चलते है। यहाँ रहने पर मेरी गुड़िया को कभी ना कभी उसकी माँ के जीवन और मृत्यु दोनों का सच पता चल ही जायेगा। तब क्या बीतेगी इस पर। इसलिए बीती बातों को हमेशा के लिए यहाँ दफना कर हमारा यहाँ से जाना ही ठीक है।" मुखिया जी नितेश से सहमत होते हुए बोले।

उनकी बात सुनकर पास खड़ा राजू बोला - "भइया जी, आप लोगों के अलावा हमारा कौन है ? हमें भी साथ ले चलिये।"

नितेश ने हामी भर दी।

कुछ ही दिनों के बाद नितेश अपनी बच्ची जिसका नाम उसने 'नितिका' रखा था, मुखिया जी और राजू के साथ दिल्ली चला गया।

मुखिया जी कभी-कभी अपने खेत और हवेली देखने और फसलों का हिसाब-किताब करने आ जाते थे, लेकिन नितेश फिर कभी मुड़कर गांव नहीं गया।

कुछ सालों बाद मुखिया जी ने भी देह त्याग दिया। जब भी कभी नितेश उन्हें याद करके दुखी होता नन्ही नितिका अपने दादाजी की छड़ी लेकर उनके अंदाज में बातें करके उसे हँसाने की चेष्टा करती।

नितिका अब नितेश की पूरी दुनिया बन चुकी थी, और वो भी अपने पापा पर जान छिड़कती थी, उनकी आज्ञा के बिना कुछ नहीं करती थी।

जब नितेश अतीत की यादों से निकला तब उसे ख्याल आया अब तक तो नितिका गांव पहुँच भी चुकी होगी। नितेश ने उसके मोबाइल पर फोन किया लेकिन फोन नहीं मिला।

"शायद गांव में नेटवर्क नहीं होगा, लेकिन उसे एक तार तो भेजना चाहिए था।

गांव देखने के उत्साह में भूल गयी होगी। है तो बच्ची ही।" नितेश स्वयं से ही सवाल भी कर रहा था और जवाब देकर स्वयं की बेचैनी को शांत करने का प्रयास भी कर रहा था।

उधर जब नितिका प्रीति के साथ अपने ननिहाल पहुँची तो उसे पता चला उसके नानाजी अब भी जीवित है।

जब उनके घर पहुँचकर उनके पैर छूते हुए नितिका ने उन्हें अपना परिचय दिया तो हेडमास्टर साहब को वो सारी गुज़री हुई बातें याद आ गयी।

वृद्धावस्था के चरम पर पहुँच जाने के बावजूद भी उनके मन में कहीं ना कहीं मुखिया जी के परिवार से अपने अपमान का बदला लेने की दुर्भावना जीवित थी।

नितिका को देखकर उनकी अब तक अधूरी रही इच्छा उन्हें पूरी होती नजर आ रही थी।

नितिका को बैठाकर वो जार-जार रोने लगे और बोले,

"बिटिया, तुझे उस दुष्ट मुखिया ने यहाँ आने कैसे दिया ? मैं तो मरने से पहले तुझे देखने की आस भी खो चुका था।"

नितिका हैरानी और गुस्से से बोली,

"ये आप किस तरह की बातें कर रहे है मेरे दादाजी के बारे में ? मैं जानती हूँ आपने ही मेरी माँ की मृत्यु के बाद हम सबसे रिश्ता तोड़ लिया था।"

"मृत्यु नहीं आत्महत्या, तेरी माँ और मेरी बेटी ने आत्महत्या की थी बेटी, जिसके जिम्मेदार तेरे दादाजी और वो नितेश था जिन्होंने अपनी दुश्मनी निकालने के लिए पहले मेरी बेटी को अपने घर की बहू बनाया और फिर तेरे जन्म के बाद उसे मरने पर मजबूर कर दिया।" हेडमास्टर साहब ने सुधा की मौत का खुलासा करते हुए कहा।

ये सुनकर नितिका को गहरा झटका लगा। किसी तरह खुद को संभालते हुए उसने कहा "अगर ऐसा था तो मेरे दादाजी और पापा मुझसे इतना प्यार क्यों करते है ? ये सारी बातें झूठी है। मैं अभी इसी वक्त यहाँ से जा रही हूँ।"

उसे अपनी बातों पर भरोसा दिलाने की अंतिम कोशिश करते हुए हेडमास्टर साहब बोले, "मैं अपनी मृत बेटी की कसम खाकर कहता हूँ कि उसने आत्महत्या की थी।"

उनकी इस बात को सुनकर अब नितिका को भरोसा हो गया कि उसके नानाजी सच बोल रहे है। आखिर कोई बाप अपनी बेटी की झूठी कसम क्यों खायेगा।

ये सोचकर उसके आँसू रुक ही नहीं रहे थे कि उसके पापा की वजह से ही उससे उसकी माँ छीन गयी और उसके नानाजी भी अकेले रह गए।

नितिका पर अपनी बात का असर होते हुए देखकर हेडमास्टर साहब बोले "अरे बिटिया, मैं भी बुढ़ापे में सठिया गया हूँ। तू इतने सालों के बाद अपने ननिहाल आयी और मैं क्या बातें लेकर बैठ गया।

तू जाकर हाथ-मुँह धो ले मैं कुछ खाने का इंतज़ाम करता हूँ। अपने नौकर को आवाज़ देते हुए हेडमास्टर साहब वहां से चले गए।

उनके जाते ही प्रीति बोली "देख नितिका, मैं नहीं जानती तेरा पारिवारिक मसला क्या है ? लेकिन इतना यकीन के साथ कह सकती हूं कि तेरे पापा तुझसे सचमुच बहुत प्यार करते है। उनका प्यार कोई दिखावा नहीं है। तू मेरे साथ चल अपने घर। वहाँ अपने पापा से सब बातें आमने-सामने कर लेना।"

प्रीति की बात सुनकर नितिका ने कहा, "नहीं प्रीति, अब मैं उस घर में कभी नहीं जाऊंगी जहाँ मेरी माँ के हत्यारे रहते है। सालों तक साथ रहने पर प्यार तो जानवर से भी हो जाता है। मैं उन्हें कभी माफ नहीं कर सकती। मैं अब यहीं नानाजी के पास रहूंगी। उन्हें मेरी जरूरत है।"

उस वक्त प्रीति ने और कुछ कहना ठीक नहीं समझा। दो दिनों तक उसने नितिका को समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब वो नहीं मानी तो प्रीति ने अपना सामान पैक कर लिया। उसे जाने की तैयारी करते हुए देखकर नितिका ने उसे अपने पापा को देने के लिए एक लिफाफा दे दिया।

 दिल्ली में अतीत की यादों और नितिका की खैर-खबर प्राप्त करने की उलझनों में नितेश डूबा हुआ ही था कि दरवाजे पर दस्तक हुई।

उसने दरवाजा खोला तो सामने प्रीति खड़ी थी।

"अरे बेटी, तुम लोग आ गए गांव से ? आओ-आओ अंदर आओ, नितिका नहीं दिख रही। लगता है बाहर छुपी है।" कहते हुए नितेश नितिका को आवाज़ देने लगा।

तभी प्रीति बोली "चाचाजी, नितिका नहीं है। वो नहीं आयी। उसने आपके लिए ये चिट्ठी दी है।"

चिट्ठी देकर प्रीति चली गयी।

नितेश ने अनहोनी की आशंका से कांपते हुए चिट्ठी खोली।

"पापा,

पता नहीं अब भी मैं आपको पापा क्यों कह रही हूँ। मुझे नानाजी ने सब बता दिया है कि किस तरह खानदानी दुश्मनी निकालने के लिए आपने मेरी माँ से शादी की और फिर मेरे जन्म के बाद आपने उसे मरने के लिए मजबूर कर दिया। नानाजी को डरा-धमका कर आप पुलिस से बच गए और मेरे साथ प्यार का दिखावा करके आप मुझे इसलिए अपने साथ ले गए ताकि मैं आपकी सच्चाई ना जान सकूं और भविष्य में आपको सज़ा ना दिलवा सकूं।

खैर, निश्चिन्त रहिए झूठा ही सही लेकिन आज तक आपने मुझे जो प्यार दिया है उसका लिहाज करके मैं आपको कानूनन सज़ा नहीं दिलवाऊंगी। लेकिन आज से आपकी सज़ा यही है कि आप मेरा चेहरा अब कभी नहीं देखेंगे।

नितिका।"

ये चिट्ठी पढ़कर नितेश अपने होश खो बैठा। इससे पहले की वो कुछ सोच-समझ पाता उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। जब उसकी आँखें खुली तब उसने अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर पाया।

उसे होश में आया देखकर राजू तुरंत डॉक्टर को बुलाने दौड़ा।

"मुझे क्या हुआ है डॉक्टर ?" नितेश ने किसी तरह हिम्मत करके पूछा।

डॉक्टर ने चुप रहने का इशारा करते हुए कहा "आपको घातक दिल का दौरा पड़ा था। लेकिन राजू जी आपको सही वक्त पर यहां ले आये। अब आप खतरे से बाहर है।"

आँसू भरी आँखों से नितेश राजू की तरफ यूँ देख रहा था मानो कह रहा हो तेरा अहसान मैं कैसे चुकाऊंगा।

राजू ने चुपचाप उसके आँसू पोंछ दिए।

जब नितेश ठीक होकर अस्पताल से घर आया तब राजू बोला "भइया जी, आखिर उस हेडमास्टर ने अपनी औकात दिखा ही दी। बिटिया के कान भरकर उसने अपने पुराने अपमान का बदला लिया है।"

"जब नितिका को ही अपने पापा पर भरोसा नहीं राजू तब क्या फर्क पड़ता है किसने क्या किया, क्या नहीं। शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है कि जिसे भी मैं दिल से चाहूं वो मुझसे दूर हो जाये।" नितेश ने टूटे उदास स्वर में कहा।

उसकी बात सुनकर राजू ने कहा, "भइया जी, छोटा मुँह बड़ी बात, लेकिन बिटिया की अभी उम्र ही क्या है ? उसने दुनिया देखी ही कितनी है कि उसे लोगों की परख होगी। फिर बिना माँ की बच्ची माँ की आत्महत्या की बात जानकर भावनाओं में बह गई जिसका उसके नानाजी ने फायदा उठा लिया।

हम तो यही कहेंगे कि आप इस तरह उन्हें हमारी बिटिया को छीनने मत दीजिये। याद रखिये सच हमारे साथ है। बहु जी की चिट्ठी आज भी हमारे पास है। उठिए और अपनी बेटी पर अपने हक के लिए लड़िये और उसे सही-गलत का फर्क बताइए वरना वो भटक जाएगी भइया जी।"

राजू की बात सुनकर नितेश को हिम्मत मिली। उसने कहा "तुम ठीक कह रहे हो राजू। बहुत परीक्षाएं दे ली मैंने। अब परिणाम का वक्त है।"

सुधा की चिट्ठी निकालकर उसे अपने सामान के साथ ठीक से रखते हुए नितेश ने गांव के टिकट के लिए एजेंट को फोन कर दिया।

अगले ही दिन नितेश और राजू सुधा के गांव में उसके घर पर थे।

उन्हें इस तरह सामने देखकर हेडमास्टर साहब के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

हिकारत भरी नजरों से उनकी तरफ देखते हुए नितेश ने कहा, "इतने बूढ़े हो गए लेकिन छल-कपट की आपकी आदत नहीं गयी।"

तभी नितिका की आवाज़ आयी, "बस पापा, आप नानाजी को कुछ नहीं कहेंगे। मुझे भी आपके मुँह से कुछ नहीं सुनना।"

"नितिका, बेटी मैं कब कह रहा हूँ कि तुम मेरे मुँह से कुछ सुनो। मैं तो बस ये चाहता हूँ कि जिस तरह तुम्हारी चिट्ठी मैंने पढ़ी उसी तरह तुम अपनी माँ की लिखी ये अंतिम चिट्ठी पढ़ लो। और अगर तब भी शक हो कि ये चिट्ठी झूठी है तो लिखाई मिलाने वालों से मिलवान करा लो कि ये चिट्ठी असली है या नकली।" और नितेश ने सुधा की चिट्ठी नितिका को थमा दी।

उस चिट्ठी को पढ़ते हुए नितिका की आँखों से आँसू गिरने लगे। वो बिना किसी से कुछ कहे अपना सामान लाकर नितेश के पास खड़ी हो गयी।

जब हेडमास्टर साहब ने उससे बात करने की कोशिश की तो नितिका ने कहा, "बहुत जल्दी आपको वकील के तैयार किये कागज मिल जाएंगे। जो संपत्ति माँ ने मुझे दी है वो मैं अनाथालय को दे रही हूँ। इसके बाद आपसे मेरा किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं रहेगा।“

सारे रास्ते नितिका चुपचाप रही।

घर पहुँचकर नितेश के पैरों पर गिरकर वो फूट-फूटकर रो पड़ी। लेकिन नितेश बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया।

नितिका को अहसास था कि बिना पूरी बात जाने उस पर जान लुटाने वाले अपने पापा पर इतना गंभीर आरोप लगाकर उसने उन्हें इतना दुख दिया है जिसकी वो कल्पना भी नहीं कर सकती।

"चाहे जो हो जाये मैं पापा को मनाकर ही रहूँगी" स्वयं से कहते हुए उसने राजू को आवाज़ दी।

राजू के आने पर नितिका ने उससे कहा "काका, पापा मुझसे बहुत नाराज है। आखिर मैंने गलती ही ऐसी की है। लेकिन काका मैं उनकी नाराजगी के साथ नहीं जी सकती।"

"बिटिया, हमारे भईया जी जिन्होंने हमेशा अपने से जुड़े लोगों को खुशियां बाँटी, उनके जीवन में बस एक ही तो खुशी थी तुम्हारे पिता होने की खुशी। इसलिए जब तुमने भईया जी को वो चिट्ठी भेजी तब उन्हें सदमे के कारण दिल का ऐसा खतरनाक दौरा पड़ा कि कुछ देर के लिए तो हम डर ही गये थे। लेकिन भगवान चाहते थे कि तुम्हारा और उनका इतना प्यारा रिश्ता झूठी नफरत से हार ना जाये इसलिए उन्होंने हम पर कृपा की।" राजू ने कहा।

नितिका की आँखों में आँसू आ गए और उसे गांव की वो रात याद आ गयी जब उसे नितेश के साथ किसी अनहोनी के होने का आभास हुआ था।

"हे ईश्वर, तेरा कोटि-कोटि आभार और काका आपका भी।" कहते हुए नितिका ने राजू के पैर छू लिए।

राजू ने उसे उठाते हुए कहा "ये क्या कर रही हो बिटिया? हमें पाप लगेगा।"

"कोई पाप नहीं लगेगा काका। अब तो बस आप मुझे बताइए कि मैं पापा की नाराज़गी कैसे दूर करूँ? नितिका ने मदद की आशा से राजू को देखा।

"हमारे भईया जी दिल के बहुत अच्छे है। लेकिन पहली बार उन्हें इतना दुख पहुँचा है तो सामान्य होने में उन्हें थोड़ा वक्त तो लगेगा बिटिया और अपने दिल के टुकड़े से वो कब तक नाराज रहेंगे। फिर भी हम सोचते है कुछ। राजू ने नितिका को आश्वासन देते हुए कहा।

बहुत सोचने के बाद राजू ने नितेश को मनाने के लिए उसे एक सुझाव दिया।

रात के खाने का वक्त हो चला था। डरते-डरते नितिका खाने के लिए नितेश को बुलाने गयी। लेकिन उसने खाने से मना कर दिया।

ये सुनकर नितिका की आँखों में फिर आँसू छलक उठे।

उसने राजू को आवाज़ देते हुए कहा "काका, आप खा लीजिये और बाकी खाना बाहर रख दीजिये। ना पापा खायेंगे ना उनकी बिटिया। तो क्या हुआ कि आज खाना उनकी बिटिया ने खुद बनाया है और बनाते हुए अपने हाथ भी जला बैठी है।"

नितिका की बात सुनकर नितेश तुरंत दवा की शीशी और रुई ले आया और कहा "चोट दिखाओ।"

नितिका ने चुपचाप अपना हाथ आगे कर दिया।

उस पर दवा लगाते हुए नितेश ने राजू से कहा "राजू, अपनी बिटिया को समझा दो आगे से ऐसी हरकत करने की जरूरत नहीं है।"

"काका, पापा से कह दीजिये मैं रोज ऐसा ही करूँगी।" नितिका ने भी जवाब दिया।

उनकी बात सुनकर राजू बोला "ऐसा है भईया जी की जिसे जिससे जो कहना है खुद कहे, हम बीच में नहीं पड़ने वाले है।

एक बात और बड़े मालिक हमें आप दोनों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी देकर गये है, इसलिए उनकी तरफ से हम आप दोनों को आदेश दे रहे है कि सीधे से खाने की मेज पर चलिये। खाने पर गुस्सा निकालना गंदी आदत होती है।"

राजू की बात सुनकर दोनों पापा-बेटी चुपचाप उसके साथ चल पड़े।

मेज पर जब नितेश ने अपनी पसंद के वो सभी व्यंजन देखें जिनका स्वाद वो अपनी माँ की मृत्यु के बाद भूल ही गया था तो वो भावुक हो गया।

लेकिन फिर अगले ही पल अपने चेहरे के भाव छुपाते हुए चुपचाप अपनी जगह पर बैठ गया।

उसके बैठते ही राजू और नितिका भी अपनी जगह पर बैठे और सबने खाना शुरू किया।

नितेश भले ही कुछ बोल नहीं रहा था लेकिन उसका चेहरा बता रहा कि उसे खाना बहुत अच्छा लग रहा था और उसे देखकर नितिका के चेहरे पर भी राहत के भाव थे।

इससे पहले की सब लोग खाने की मेज से उठते, नितिका बोली "काका, पापा से कहिये आज हमेशा की तरह उन्होंने मुझे पहला कौर तो नहीं खिलाया कम से कम अंतिम कौर ही खिला दें।"

उसकी बात सुनकर नितेश ने चुपचाप उसे एक कौर खिलाया और अपने कमरे में चला गया।

नितिका भी अपने कमरे में चली गयी और फूट-फूटकर रोने लगी।

उसके रोने की आवाज़ जब राजू और नितेश के कानों में पड़ी तब दोनों परेशान हो गए।

हारकर राजू ने नितेश से कहा "भईया जी, बिटिया तो बच्ची है, नासमझी में भावुक होकर गलती कर बैठी पर आप क्यों बचपना दिखा रहे हैं? चलिये उठिए वरना बिटिया अपनी तबियत खराब कर लेगी तब आप रोने बैठ जाएंगे और मैं बेचारा आप दोनों के पीछे कभी रुमाल, कभी दवा लेकर घूमता रहूँगा।"

राजू की बात सुनकर सहसा नितेश के होंठो पर मुस्कान आ गयी।

वो नितिका के कमरे में जाकर उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा तो नितिका बोली, "नहीं पापा आज बह जाने दीजिए इन आँसुओं को और इनके साथ उन कुछ दिनों की बुरी यादों को जब आपकी इस नालायक बेटी ने आप पर, आपके प्यार पर संदेह किया। पता नहीं मैं कैसे उन लोगों की बातों में आकर इतनी अंधी हो गयी कि आपका निःस्वार्थ प्रेम और त्याग समझ ही नहीं सकी।"

कुछ देर रो लेने के बाद जब दोनों पिता-पुत्री का मन हल्का हो गया तब नितेश ने नितिका से पूछा "ये तो बताओ तुमने वो सारे व्यंजन कैसे बनाएं जो सिर्फ तुम्हारी दादी बनाती थी? तुम्हें किसने सिखाया?"

"राजू काका ने मुझे उन व्यंजनों के नाम बताये और मैंने गूगल पर उन्हें बनाने का तरीका खोज लिया। जब गूगल है तो क्या गम है?" कहते हुए नितिका ने अपना फोन नितेश के हाथ में दे दिया।

नितेश ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा "मेरी बिटिया तो बहुत होशियार हो गयी है।"

"हाँ पापा, इतनी होशियार की अब कभी आपसे दूर होने की बेवकूफी नहीं करेगी।" नितिका अपने पापा के सीने पर सर रखते हुए बोली।

फिर दोनों मुखिया जी की तस्वीर के पास पहुँचे और उनकी दूरदर्शिता के लिए उन्हें नमन किया। अगर उन्होंने सुधा की चिट्ठी संभालकर ना रखी होती तो आज नितेश और नितिका एक बार फिर से अपने घर में एक साथ ना होते।

मुखिया जी की तस्वीर मानों मुस्कुराते हुए उन्हें आशीर्वाद दे रही थी कि कभी अपनों पर अविश्वास मत करना और किसी की भी बात पर आँख बंद करके भरोसा मत करना।

अपने पिता को याद करके उदास हुए नितेश को देखकर नितिका बचपन की तरह अपने दादाजी की छड़ी उठा लायी और उनके अंदाज में बोली "अरे ओ बिटवा, काहे दुखी हो ? देखो तो गुड़िया आ गयी ना घर। उसे भी अक्ल आ गयी और तुम्हारा गुस्सा भी शांत हो गया।"

नितिका की इस शरारत पर नितेश हँस पड़ा।

दोनों को पहले की तरह सहज देखकर राजू बोला "भईया जी, बहुत दिनों के बाद घर में खुशियां लौटी है। क्यों ना इस मौके पर हमें वो गीत सुनने को मिले जो आप और बिटिया मिलकर गाते है।"

उसकी बात सुनकर नितिका बोली "चाचाजी, आपको वो गीत सुनने के लिए तभी मिलेगा जब आप भी उसे हमारे साथ गाएंगे। आखिर आप भी इस परिवार का अहम हिस्सा है।"

नितिका के सर पर हाथ रखकर उसके स्वर में स्वर मिलाकर राजू और नितेश गुनगुना उठे "ज़िन्दगी प्यार का गीत है..."

अपने तीनों सदस्यों के चेहरे पर फिर से मुस्कान को लौटते हुए देखकर कुछ वक्त पहले सूनेपन की चादर ओढ़े हुए ये घर एक बार फिर से गुलज़ार हो चला था।


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