यूज एंड थ्रो
यूज एंड थ्रो
"दादाजी कल मुझे स्कूल में " प्लास्टिक को कहें - नो " पर अपनी बात कहनी है। क्या कहूँ बताइए ना.... " आठवीं में पढने वाले शुभम् ने कांतिलाल जी से पूछा।
" बहुत बढिया...., देखो बेटा आज से पच्चीस साल पहले हमारे जमाने में प्लास्टिक था जरूर पर इस तरह नहीं कि हर चीज ही पलास्टिक की बनी हो। अब तो दूध के पैकेट से लेकर ग्लास, कप, प्लेट, बाल्टी, कुर्सी जाने क्या - क्या है सब का सब प्लास्टिक, ऊपर से ये पतले- पतले पॉलीथिन ....। चाहे सौ ग्राम धनिया लेना हो, चाहे किलो भर दाल हर चीज प्लास्टिक पैकिंग, गाय की रोटी तक हम प्लास्टिक में डालकर धर देते हैं। फिर चाहे उसे खाकर हमारी गाय माता मर जाये या बिमार हो जाए इससे बढ़कर हद तो तब हो जाती है जब प्लास्टिक बंद करने की बात करते है और नॉनऑवन बैग के रूप में फिर प्लास्टिक का थैला पकड़ा देते है।
अरे भाई हम तो जब भी घर से निकलते थे एक कपङे का थैला हमेशा साथ में होता था।"
" बिल्कुल सही दादाजी, अब हमें फिर से अपनी पूरानी संस्कृति की और लौटना होगा " पास बैठी बड़ी पोती अदिति ने सहमति जताते हुए कहा।
" बिल्कुल अदिति, हमारी संस्कृति ने जिन मूल्यों को हमें सौंपा है वो बेहद सुसंस्कृत है। पूराने समय में हम एक लौटा पानी भी फालतू नहीं यूज करते थे, पेङ पौधों को काटना पाप समझते थे, खेत और औजारों की पूजा करते थे और आज....पता नहीं ये यूज एंड थ्रो कब और कैसे हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गई। यही आज हमारे ज्यादातर दुखों का कारण बनी हुई है। हमने तो रिश्तों को भी यूज एंड थ्रो का हिस्सा बना दिया।"
" दादाजी आप विषय से भटक रहें है। मुझे प्लास्टिक पर बोलना है संस्कृति पर नहीं..." शुभम् ने कांतिलाल जी को याद दिलाते हुए कहा।
" हाँ बेटा, मुझे याद है कि तुम्हें प्लास्टिक पर बोलना है पर इतना याद रखना ये सब सिर्फ कहने भर का ढकोसला न बने तभी सार्थकता है वर्ना सिर्फ थूक बिलोना ही होगा।"
" जी दादाजी, बिल्कुल हमारे सर भी यही कह रहे थे।"
" बस कथनी- करनी में समानता आ जाए और इस यूज एंड थ्रो की संस्कृति मुक्ति मिल जाए ....।बस इतना कर मेरे प्रभु ..." कहते हुए कांतिलाल जी ने हवा में हाथ जोड़ दिए।
जाने क्या सोचकर पर दादाजी के साथ शुभम् और अदिती के भी हाथ हवा में जुड़े हुए थे।
