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Drama Tragedy Others

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यात्रा - गुलाम

यात्रा - गुलाम

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यात्रा पर निकलते वक्त मेरा न तो रूट तय रहता है और न ही वक्त। इस बार की यात्रा भी बड़ी दूर दूर तक यानी की कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की रही। ऐसे ही घूमते घूमते पंजाब के एक छोटे से गांव के पास से गुजरते हुए रात का अंधेरा छाने लगा था। हालांकि नजदीकी शहर पहुंचा जा सकता था परंतु सामने रोड से थोड़ा हटकर एक गुरुद्वारा भी दिख रहा था। गुरुद्वारे रात गुजारने के लिए सबसे बेहतरीन जगह है हालांकि गांव के गुरुद्वारे बहुत सुविधाएं नहीं दे पाते परंतु रहने के लिहाज से फिर भी बेहतरीन है। कुछ फैसला करके नजदीकी शहर जाने का फैसला रोक कर उसी गुरुद्वारे की तरफ गाड़ी मोड दी।

खाना खाने के बाद वहीं गुरुद्वारे के एक बुजुर्ग से ही बातचीत में पता चला की गांव से मेरा संबध है हालांकि कुछ दूर का परंतु फिर भी संबंध तो है।

मेरा ननिहाल पंजाब के एक छोटे से गांव में है वही से किसी महिला की शादी इस गांव में हुई थी और वो अब भी यही रहती है। रिश्ते में कहा जाए तो यह महिला मेरी दादी या शायद नानी लगती है। इसका मतलब गांव में मेरे रिश्ते के भाई लोग भी रहते है।

अगली सुबह रिश्तेदार से मुलाकात करने के लिए चला गया। वही पर मेरी रिश्ते की नानी से भी मुलाकात हुई। शायद ग्रामीण आवभगत ही थी जिसके कारण अगले दो दिन वहां गुजारने पड़े।

इन्ही दो दिनों में घर के हालात पता चले। 

नानी की शादी कई दशक पहले इसी गांव में हुई थी और शादी के कुछ साल बाद ही उनके पति यानी की मेरे नाना का देहांत हो गया। उस वक्त नानी एक लड़के और दो लड़कियों की मां थी। लड़का एक ही था लेकिन लड़किया दो शायद कन्या भ्रूण हत्या के कारण ही सिर्फ दो कन्याएं थी।

वक्त आने पर लड़के और लड़कियों की शादी करके नानी अपनी सभी जिमेदारियों से आजाद हो गई परंतु शायद किस्मत को यह मंजूर नहीं था। लड़के की शादी को अभी दो या तीन साल ही गुजरे थे की लड़के ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या क्यों को यह तो पता नहीं लेकिन चलो मान लेते है की किसान पैदा ही आत्महत्या के लिए होते है। वैसे दादी या नानी के यहां किसानी नहीं दुकानदारी होती है।

जिस वक्त लड़के ने आत्महत्या की उस वक्त वो एक लड़के और एक लड़की की दादी बन चुकी थी , सिर्फ एक ही पोती हाय यह कन्या भ्रूण हत्या।

वक्त गुजारा और आखिर लड़की और लड़के दोनो की भी शादी हो गई। जिस वक्त नानी की यहां शादी हुई उस वक्त परिवार काफी बड़ा था परंतु अब आखिर घर पर तीन सदस्य ही रह गए नानी, नानी का पोता और पोते को दुल्हन।

शायद पोते को दुल्हन को दादी पसंद नहीं थी या शायद उसे कुछ और समस्या रही हो लेकिन दादी को घर से निकाल दिया गया। लगता है की दुल्हन को पोता भी पसंद नहीं था लिहाजा नानी को घर से निकालने के बाद भी वो रुक नहीं पाई और तलाक लेकर चली गई , साथ में ले गई मोटी रकम। यानी को नानी की एकमात्र दुकान बिक गई।

एक बार फिर से नानी को घर लेकर आया गया परंतु नानी ने घर आने से मना कर दिया , शायद वो गुरुद्वारा में अपना मन रमा चुकी थी।

उधर पोते की दुल्हन को प्यार हो गया , सच्चा वाला प्यार, एक कुछ उम्रदराज लगड़े आदमी से। सच्चा प्यार कुछ नहीं देखता न उमर , ना पैर की लंगडाहट , न लंबाई , ना बोनापन , ना मर्दानापन, ना कुछ और बस सच्चा प्यार तो हो जाता है जब वक्त आता है। वैसे लंगड़ा काफी पैसे वाला है पर यह तो सच्चे वाला प्यार था बिल्कुल सच्चे वाला, तो लंगड़े की प्रॉपर्टी को बात करना ही व्यर्थ है, हां नी तो।

प्यार तो सच्चा था परंतु लंगड़ा ठरकी निकला , अरे वही दहेज और डोमेस्टिक वायलेंस वाला ठरकी। अब भला सच्चा प्यार कब तक टिकता ठरकी के सामने लिहाजा दुल्हन एक बार फिर मोटा पैसा कमा कर वापिस अपने बाप के पास लौट आई। लौटने से पहले एक बच्चे को पैदा करना भी जरूरी था आखिर लंगड़ा लंबी चौड़ी प्रॉपर्टी का स्वामी था और प्रॉपर्टी का हिस्सेदार तो पैदा करना जरूरी था न। लिहाजा एक बच्चा भी साथ वापिस आया।

चाहे जो हो धंधा तो धंधा है ऐसे ही चलता है। मुझे इससे क्या लेना देना और ना ही नानी को इससे कोई लेना देना होना चाहिए।

परंतु नानी ऐसा नहीं सोचती, नानी को इससे बहुत लेना देना है। अरे नहीं इसीलिए नहीं को किसी का धंधा अच्छा चल रहा है बल्कि इसीलिए क्योंकि अब वो दुबारा दादी की बहु बनने की कोशिश कर रही है और दादी का पोता दुबारा उससे शादी करने को जिद पकड़े बैठा है। और पोते की दुल्हन इस बार अपनी दादी सास को सेवा भी करना चाहती है। और वही सच्चे दिल वाली सेवा लिहाजा नानी इस वक्त अपने घर पर ही है।

नानी ने मुझे कहां की पोते से बात करूं उसे समझाने की कोशिश करूं , लेकिन कुछ लोग पैदा ही गुलामी के लिए होते है उन्हे समझाया नहीं जा सकता और व्यर्थ प्रयास करके अपना वक्त बर्बाद करना मुझे पसंद नहीं। लिहाजा मैंने भी पोते से बात नहीं को बस उसे बता दिया कि नानी उसके फैसले से सहमत नहीं है। इसके बाद मैने भी विदा ली।

बस विदा होने से पहले नानी और गुरुद्वारे के बुजुर्ग को अपना नंबर देकर चला आया ताकि जब दादी दुबारा गुरुद्वारे पहुंच जाए तब मुझे खबर मिल जाए। शायद में कुछ कर न पाऊं लेकिन खबर तो मिलनी ही चाहिए शायद कुछ कर सकूं।


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