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Kumar Vikrant

Inspirational


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Kumar Vikrant

Inspirational


याचक विधा

याचक विधा

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याचक को कभी खाली हाथ ने जाने देने की एक लम्बी परम्परा रही है मेरे परिवार में। पुरखो, दादा-परदादा के दान-धर्म के बड़े किस्से कहे जाते रहे है परिवार में। परम्परा में अपवाद रहे है मेरे पिता, जिनसे कोई याचक, फ़क़ीर एक दमड़ी नहीं निकलवा सकता है। खैर ये परम्परा मुझ तक भी चली आयी, और बदस्तूर जारी भी है बावजूद इसके कि याचक के फ्रॉड होने व किसी गिरोह से सम्बन्ध होने की सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

विभिन्न कारणो से दिल्ली आना-जाना अक्सर लगा रहता है। सर्दी की वो शाम भी इसका अपवाद नहीं थी। एक मित्र के साथ कार से दिल्ली से वापिस आ रहा था। शामली तक आते-आते मेरा मित्र, जो एक चेन स्मोकर था मेरी वजह से बड़ा परेशान था। मैं स्मोकिंग नहीं करता हूँ, और न ही अपने आस पास किसी को स्मोकिंग करने देता हूँ। तीन घंटे से बिना स्मोकिंग किये मेरा मित्र बैचैन हो उठा और शामली में आते ही बोला- "भाई कार रोक, मुझे हल्का होना है।" मैं जानता था वो किसी पान की दुकान पर जाकर सिगरेट पियेगा, मैंने भी लगभग उजाड़ पड़े रोडवेज स्टेशन पर जाकर सड़क के किनारे कार रोक दी। वो कार से उतर कर चला गया और मैं मोबाइल पर एक जरूरी कॉल करने लगा। मैं बातचीत में व्यस्त था तभी वो श्वेत वस्त्रधारी बुजुर्ग कार के पास आ कर खड़ा हो गया। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पायजामा, सर पर सफ़ेद गाँधी टोपी। कुछ हिचकिचाहट के साथ वो मेरी तरफ बढ़ा और बोला- "बेटा एक कप चाय का पिलवा दोगे?"

मैं फोन पर व्यस्त न जाने किन ख्यालों में खोया था कि मैंने हाथ से इशारा कर उस बुजुर्ग को वहां से चले जाने को कहा। वो बुजुर्ग कुछ सकुचाते हुए मुस्करया और और हाथ उठाते हुए बोला- "कोई बात नहीं बेटा।"

ये कहकर वो चला गया, परन्तु मुझे लगा कि मुझसे कुछ गलत हो गया है। मैं कार से उतर आया और उस बुजुर्ग की तलाश में चारो तरफ और देखा पर वो कही नजर नहीं आया। दौड़ते हुए बस स्टैंड के भीतर भी गया पर वो तो वहां भी नहीं था, कही भी नहीं था।

मैं परेशान था की बिना मतलब हट्टे-कट्टे मुस्टंडो को दान देने वाला मैं, आज एक बुजुर्ग याचक का अपमान कर बैठा। पता नहीं कौन था वो, कदाचित मेरे दान-धर्म की परीक्षा लेने आया था और मैं उसको निराश करके, इस परीक्षा में फेल हो गया था।

"क्या बात है, खुली कार छोड़ कर कहाँ घूम रहा है ?" मेरे मित्र की आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी।

उसकी बात अनसुनी करके मैं अपने ख्यालों में खोया वापिस कार की तरफ चल पड़ा।

उस घटना के बाद कदाचित कोई याचक मुझसे निराश हुआ होगा, हर याचक में मुझे वो श्वेत वस्त्र वाला बुजुर्ग नजर आता है, जो मुझे फिर कभी नहीं मिला।


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